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दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे।
ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर संभव प्रयास करते हैं उसके लिए अवसर जुटाते हैं। चाहे वो कितना ही अयोग्य क्यों न हो। ऐसे मतलबी लोगों का गुट होता है। ये सब इस सिद्धांत पर चलते हैं तुम हमारे काम करो हम तुम्हारे काम करेंगे। ऐसी ही प्रवृत्ति के एक कवि थे गर्वित जी वैसे तो वे बहुत जूनियर थे पर चलते पुर्जे टाइप के इंसान थे। जितने घटिया कवि थे उतने ही घटिया वे इंसान भी थे। अक्सर कवि गोष्ठियों में वे मिल जाया करते थे और अपनी उबाऊ बेसिर पैर की कविताएँ सुनाकर तंग करते थे। उन्होंने अचानक कवि गोष्ठियों में आना बंद कर दिया। वे कवि सम्मेलनों में व्यस्त हो गए थे। हमें हैरत हुई कि ये चमत्कार कैसे हो गया। पता चला कि पूरे देश के अड़तालीस मंचीय कवियों का गुट है। हर कवि के जिम्मे चार कवि सम्मेलन आयोजित करने वाले आयोजकों से घनिष्टता बढ़ाकर गुट के कवियों को उसमें शामिल कराना तथा पैसा दिलवाना है। इससे हर कवि को महीने में चार कवि सम्मेलन मिल रहे थे। सबकी दाल रोटी अच्छे से चल रही थी। एक दूसरे कविता चुराना चुटकुले चुराना उन्हें सिखाया जाता था। वे किसी और को आगे आने ही नहीं देते थे। ऐसे लोगों ने वास्तविक अच्छे कवियों को बाहर कर दिया है और खुद छाकर कविताओं का बेड़ा गर्क करने पर तुले हैं।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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