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सफलता का नशा (व्यंग्य)

सफलता पाने के लिए लोग कितना संघर्ष करते हैं ऐड़ी चोटी तक का जोर लगा देते हैं। जब ये लोग संघर्ष कर रहे होते हैं तो बड़े निरीह और मासूम नज़र आते हैं। इतने मासूम कि किसी को भी देख कर तरस आ जाए और यही जब सफल हो जाते हैं तो इनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि जो पेड़ फल से लदा होता है वो झुक जाता है। पर सफलता पाने के अहं में चूर हुए लोग खजूर के पेड़ की तरह हो जाते हैं। जिसके हर पत्ते में काँटे होते हैं जिसकी छाया घनी नहीं होती और कोई उसकी छाया के नीचे नहीं बैठता क्योंकि उसे डर रहता है काँटो से भरे पत्तों का समूह अगर उस पर गिर गया तो वो ज़ख्मी भी हो सकता है। कहते हैं सफलता का नशा सर चढ़कर बोलता है। ऐसा अभिमानी इंसान सभी को तुच्छ समझने लगता है और अपने आपको सर्वश्रेष्ठ और उसकी यही सोच उसके लिए घातक सिद्ध होती है। कुछ लोग सफल होने के बाद उनसे भी वास्ता ख़त्म कर लेते हैं जिनका उनकी सफलता में बड़ा योगदान रहता है। कहते हैं सफलता के शिखर पर कोई अधिक देर नहीं ठहर सकता फिर जब उनका पतन होता है तो उनकी खोजखबर लेने कोई नहीं पहुँचता ऐसे लोग गहरी खाई में गिरकर गुमनाम हो जाते हैं। लेकिन जो अच्छे इंसान होते हैं वे सफल होने पर ओर अधिक विनम्र हो जाते हैं। उनमें लेशमात्र भी अभिमान नहीं होता है। ये भले लोग सबके भले की बात सोचते हैं और भलाई के काम में हिस्सा लेते हैं। इनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आती। ये वास्तविक सम्मान के हकदार होते हैं। इनके पास चापलूसों की फौज नहीं होती। ऐसे अनेकों उदाहरण होने के बाद भी लोग इनसे सबक नहीं लेते और पतन की राह पर चलकर अपने आपको मिटा देते हैं।
ख़ूबीलाल जी की कभी शहर में जूते की सबसे बड़ी दुकान थी। आठ नौकर काम करते थे और उन्हें काम से फुर्सत नहीं मिलती थी खूब धन था। आज वही खूबीलाल ई रिक्शा चलाते हुए नजर आए। तब वे बोले खास अपनों ने ही चपटा कर दिया सब कुछ छिन गया। मुझे बहुत घमंड था अपने आप वो सब चूर चूर हो गया। मकान दुकान जमीन जायदाद सब बिक गई है। मैं एक किराये के छोटे से मकान में रह रहा हूँ। अब मेरी खोज खबर लेने वाला कोई नहीं है। इसमें किसी का कोई कसूर नहीं है। गलती मेरी है मुझमें अभिमान बढ़ गया था जिसके कारण मुझे यह दिन देखने पड़ रहे हैं। मिटा हुआ पूरी तरह बर्बाद हुआ आदमी मुश्किल से ही संभल पाता है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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