सबसे ज्यादा दुखी और परेशान वे अधिकारी और कर्मचारी हैं जिनकी कोई पहुँच नहीं है जिनकी सत्ताधारी दल के स्थानीय लोगों से पटरी नहीं बैठ पा रही है यह काम के बोझ के तले दबे रहते हैं और उफ तक नहीं कर सकते इसके बाद भी इन्हें वरिष्ठों की डाँट फटकार सुनना पड़ती है इन्हें निलंबन का डर दिखाया जाता है वेतन वृद्धि रोकने तनख्वाह काटने या रोकने की धमकी दी जाती है और ये चुपचाप अपना काम करते रहते हैं इनकी प्रशंसा करने वाला कोई नहीं होता। डाँटने फटकारने वाला धमकी देने वाले लोग अनगिनती होते हैं। दूसरी ओर जो प्रभावशाली हैं वो मुफ्त की तनखा ले रहे हैं अधिकारियों को धमका रहे हैं किसी की कोई मजाल नहीं है जो इनका बाल भी बाँका कर सके।
रतनपुर गाँव के सरकारी मिडिल स्कूल के उमेश सर उन शिक्षकों में से थे जिनका कहीं कोई सोर्स नहीं था एकदम पाॅवर लेस थे सारे स्कूल का भार उनके काँधे पर था एच एम सरपंच के भाई थे सुरेखा मेडम के पति जनपद सदस्य थे। चपरासी मुकेश पटेल का भतीजा था पटेल स्थानीत दबंग नेता थे। बाकी दो मेडम भी रुतबे वाली थी इनमें से कोई स्कूल नहीं आता था विद्यालय में मात्र बारह छात्र पढ़ते थे। ऊनमें चार ही रोज स्कूल आते थे । उमेश सर रोज समय से स्कूल आते थे सारा काम करते थे बाकी और कोई स्कूल नहीं आता था उस स्कूल का कभी निरीक्षण नहीं होता था । सरपंच दबंग था वो कई लोगों की पिटाई कर चुका था इसलिए सब उससे डरते थे उमेश सर पूरा सूकूल सम्हाल रहे थे कायदे सेवो स्कूल बंद हो जाना चाहिए था मगर किसी की मजाल नहीं थी कि वो स्कूल बंद करवा सके। वो स्कूल मुफ्तखोरों की चारागाह बना हुआ था सरकार सात लाख रुपये महीन स्टाफ के वेतन पर खर्च कर रही थी और चार बच्चे आ रहे थे जिन्हें भी पढ़ना लिखना तक नहीं आता था फिर भी किसी को कोई कार्रवाई का भय नहीं था।
यह तो एक जगह का उदाहरण है ऐसे उदाहरणों की भरमार है जो व्यवस्था में घुन की तरह लगे हैं । यह वो घुन हैं जिनको हटाने की किसी में दम नहीं है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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