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कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी। कल रात को उसने छोटी बकरी का जन्म दिया तथा जन्म देने के कुछ देर बाद ही तड़फकर मर गई। हमें कुछ करने का मौका ही नहीं मिला। अब उसकी बच्ची हमारे पास है, उसकी चिंता है उसे कैसे पालेंगे हम। यह सुनकर रमणलाल ने कहा बकरी की वो बच्ची आप मुझे दे दो बदले में आप मेरी मजदूरी के बकाया पैसे मत देना। हेमराज को रमणलाल की ये बात और अच्छी लगी। उसने वो बकरी की बच्ची उसे सौंप दी। रमणलाल उसे खुशी खुशी घर ले आए। उस बकरी ने व्यस्क होने पर एक साथ तीन बच्चों को जन्म दिया, सभी मादा थीं। वे बकरी की बच्ची भी बड़ी होकर बच्चे पैदा करने लगी थीं। दो साल में रमणलाल के पास दो दर्जन बकरियाँ हो गई थीं। छः महीने बाद ये आँकड़ा चालीस तक पहुँच गया था। जिसमें आठ बच्चे नर थे। रमणलाल ने साल भर बाद उन्हें दो लाख रुपये में बेचा था। बकरियों का दूध उसके घर से ही बिकने लगा था। उसकी अतिरिक्त आमदानी उसे हो रही थी। सभी बकरियाँ पत्ती खातीं थीं जिसकी जंगल में कोई कमी नहीं थी। रमणलाल दूध के अलावा मावा भी बेचता था। अब रमणलाल की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई थी। संपन्न होने पर रमणलाल की शादी भी हो गई थी। बकरियों की सँख्या और बढ़ गई थी। रमणलाल को बकरियों ने संपन्न कर दिया था। आज उसके पास एक सौ साठ बकरियों के कारण वो खूब फल फूल रहा था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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