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कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था। 
कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोनों बहने    क्रमशः पाँच व आठ साल की थीं।  अब एक  उन्चालीस वर्ष की होने जा रही थी और दूसरी बयालीस वर्ष की हो चुकी थी।  पति के निधन के बाद कंचन  को अनुक॔पा नौकरी मिर गई थी वे बिल्कुल पढ़ी लिखी नहीं थी  इसलिए उन्हें चपरासी की नौकरी मिली  थी अगर उन्होंने अपनी सही उम्र लिखाई होती तो वे अब तक रिटायर हो चुकी होती लेकिन अभी उनकी दस वर्ष की नौकरी और भी बाकी थी  वेतन के अलावा उन्हें पेंशन भी मिलती थी  वेतन उनका  सैंतालीस हज़ार था और पेंशन सतरह हजार रुपये मिल रही थी  कुल मिलाकर चौंसठ हजार रुपये महीने उन्हें प्राप्त हो रहे थे इन पैसों में दोनों माँ बेटों का गुजारा आराम से चल सकता था इसके अलावा उनके पास पाँच एकड़ सिंचित जमीन भी थी पर इसके बाद भी वे कर्ज में डूबे हुए थे  कंचन जी का तो कोई खर्चा था नहीं उनके सारे पैसे उनका लड़का   दारू मुर्गा में उड़ा देता था  यह सिलसिला क ई सालों से चल रहा था रवीन्द्र सिंह ने ग्रेज्यूशन तो कर लिया था पर अपने लिए नौकरी नहीं ढूँढी  थी आखिर माँ के वेतन और पेंशन उसी को तो मिलती थी क्योंकि ए टी एम कार्ड रवीन्द्र सिंह के पास ही था। दो वर्ष पूर्व तक उनका मकान कच्चा टीन शेड वाला था जिसे उन्होंने बैंक से लोन लेकर पक्का बनवा लिया था इसके लिए   उन्होंने बैंक से पैंतीस लाख का कर्ज लिया था।  जिसकी किश्त बयालीस हजार  रुपये प्रतिमाह आती  थी जिससे उनका आर्थिक संकट  और बढ़ गया  खेती से कोई लाभ नहीं क्योंकि खेती करने वाला कोई इच्छुक नहीं तो खेती नौकरों के भरोसे छोड़ दी थी  मकान पक्का  देखने के  बाद के बाद लड़की  लड़की वाले पूछते  लड़का कहाँ नौकरी कर रहा है तो सब चुप हो जाते इसका जवाब देने के लिए  रविन्द्र सिंह ने  यह नौकरी की थी  इस बीच बरसात का मौसम आ गया  था  और शादी चार माह  के लिए टल गई थी। यही कारण  था कि कंचन अपने बच्चे  रविन्द्र् को  नौकरी   करने के लिए  कह रही थी ।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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