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कहानी: झूठा इल्जाम

कुसुम अपने पति परेश की हत्या के झूठे इल्जाम में झूठी गवाही के कारण आजीवन कारावास की सेन्ट्रल जेल में सजा भुगत रही थी आठ साल पूरे हो गए थे और वो यह मान चुकी थी की अब उसे मरते दम तक जेल में ही रहना है ।पर अचानक इन छः महीने में झूठ की बुनियाद हिल गई जिसने झूठी गवाही दी थी उसने सच बता दिया और जो सबूत छिपाए थे वो भी बता दिए जिस से कुसुम को कारावास से मुक्ति मिल गई थी जो वास्तविक दोषी थे वे जेल की हवा खा रहे थे। वह जेल से सीधे मायके आ गई थी अदालत ने उसे दोषमुक्त कर दिया था उसकी सजा विलोपित कर दी गई थी याने उसे सजायाफ्ता नहीं माना गया था सजा के समय उसका बेटा ऋतिक तीन साल था जो अब ग्यारह साल का हो गया था कुसुम की उम्र भी बयालीस साल की हो गई थी।अब उसका एक मात्र लक्ष्य अपने बेटे ऋतिक को कामयाब बनाना था।
बात आठ साल पहले की है उसके घर उसकी सौतैली ननद मानसीआई हुई थी मानसी शादीशुदा थी पर उसका पति राजीव लापरवाह इंसान था उसे जुए की लत भी थी। कुसुम के पति परेश का ऑटोमोबाइल का शोरूम था शोरूम कुसुम के नाम था परेश से मानसी ने बारह लाख रुपये का कर्ज लिया था और कहा था कि वो ब्याज सहित ये कर्ज अदा कर देगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं कर्ज लिए दो साल हो गए न मानसी ने ब्याज दिया न कर्ज अदा किया उसके पति राजीव ने वो सारी रकम जुए और सट्टे में उड़ा दी थी। परेश को रुपये की जरूरत थी वो मानसी पर कर्ज लौटाने का जोर डाल रहा था उसी सिलसिले में मानसी परेश के यहाँ आई थी और कह रही थी बस भैया जल्दी ही आपकी पाई पाई अदा कर दूँगी यह सुनकर परेश का लहजा बदल गया था वो नर्म लहजे में बात करने लगा था पर मानसी के मन में तो कुछ और ही था बड़े अच्छे से वो परेश से बोली भैया मैं आईसक्रीम लाई हूँ बढ़िया आइसक्रीम है मावेवाली और फिर तीनों ने आइसक्रीम खाई तीनों की प्लेट अलग अलग थी आइ क्रीम खाने से और किसी को तो कुछ नहीं हुआ पर परेश की हालत बिगड़ गई अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट में पता चला कि परेश को तेज जहर दिया गया था। तेरहवीं होने के बाद पुलिस आई और कुसुम को परेश की हत्या के इल्जाम में पकड़कर ले गई । मानसी ने झूठे बयान में कुसुम पर परेश को जहर देकर मारने का आरोप लगाया था जो नौकर बाबू लाल था उसने भी कुसुम के खिलाफ बयान दिए थे कुसुम के पास अपनी बेगुनाही का कोई सबूत नहीं था उसे इस बात का संतोष था कि उसके माता पिता और भाई उसे निर्दोष मान रहे थे उसके शोरूम का मैनेजर अनुराग भी उसे निर्दोष मान रहा था उसने कहा था आप जरूर बरी होकर आएँगी तब तक शोरूम को ईभानदारी के साथ मैं चलाऊँगा। कुसुम जेल में रोती रहती उसका सब कुछ लुट गया था पति की मौत हो गई थी बेटा भैया के पास था और वह सजा काटकर कलंकित जीवन बिता रही थी लेकिन सच की जीत होती है एक दिन नौकर बाबूलाल ने थाने जाकर सारी बात सच सच बता दी तथा सबूत भी बता दिए यह सब बताकर उसे ऐसा लगा जैसे कोई भारी बोझ उसके सर से उतर गये हो पुलिस ने नए सिरे से जाँच की उसमें कुसुम को निर्दोष पाया पुलिस ने मानसी और उसके पति को गिरफ्तार कर लिया था तथा कुसुम को जेल से रिहा कर दिया था। अब उसे फिर से अपनी जिंदगी की शुरुआत करना थी कमाई की चिंता नहीं थी उसका शोरूम अच्छा चल रहा था मैनेजर ने पूरी ईमानदारी से अपना काम किया था । आज कुसुम बहुत हल्का महसूस कर रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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