शिक्षक राम कृष्ण जी का रिटार मेन्ट का समय नजदीक था छः महीने रिटार मेन्ट में बचे थे लेकिन संकुल केन्द्र के बाबू ने उनकी सर्विस बुक का ट्रेजरी से वेरीफिकेशन नहीं कराया था जिस के कारण दो साल से उनके डी ए का एरियर नहीं मिला था दो वर्ष के वेतन का दुबारा फिक्सेशन होना था वो नहीं हुआ था वेतन में उन्हें आठ हज़ार रुपये प्रतिमाह का नुक्सान हो रहा था वो तो जब वे एक बार मंदिर गए तो वहाँ पर जिला ट्रेजरी ऑफिसर राकेश वर्मा मिल गए उन्होंने सर को पहचान लिया पैर छूकर बोले सर में आपका शिष्य हूँ आपने मुझे पढ़ाया है आपकी पढ़ाई गणित के कारण मैं आज ट्रेजरी ऑफिसर हूँ। आपके रिटायर मेन्ट में कितना समय है वे बोले छः महीने बचे हैं । और अभी तक सर्विसबुक का वेरीफिकेशन नहीं हुआ है फिक्ससेशन नहीं हुआ है सब मिलाकर पाँच लाख रुपये का एरियर बकाया है । इस पर वर्मा जी ने संकुल केन्द्र का नाम पूछा और कहा दस दिन में आपका पूरा काम हो जाएगा। और वर्मा जी ने अपना वादा निभाया आज उन्हें पूरे सात लाख रुपये ऐरियर के मिल गए थे तथा बढी हुई तन्ख्वाह आई थी आठ हजार रुपये वेतन में बढ़े थे आज वो बहुत खुश थे।
राकेश वर्मा ने अपने गुरूजी रामकृष्ण जी से वादा करने के बाद संकुल केन्द्र के बाबू राजेश को बुलवाया तथा उससे सर की सर्विस बुक मँगवाई बाबं बोला उन्होंने पैसे नहीं दिए हैं इस पर वर्मा जी बोले वो मुझे रुपये दे गए हैं वर्मा जी ने अपनी जेब से छः हज़ार रुपये बाबू को दिए और कहा ये तुम्हारा और संकुल प्राचार्य का हिस्सा और साथ ही ये भी कहा कि उनके रिटायर मेन्ट के सारे कागज समय पर तैयार कर देना पैसे की चिंता मत करना पैसे मैं खुद दूँगा। बाबू बोला ठीक है।
बाबू को रामकृष्ण सर का सीधे ट्रेजरी ऑफिसर से मिलना समझ नहीं आ रहा था और कैसे सर ने सारी रकम सीधे उनको दे दी वो रुपया मिलने के बाद रामकृष्ण सर के घर गया सर से उसने कहा इस काम के ट्रेजरी ऑफिसर को कितने रूपये दिए तब सर ने कहा एक रुपया भी नहीं दिया कसम खाकर कहता हूँ वो तो मेरे शिष्य हैं भला वो मुझ से कैसे रुपये लेंगे सुनकर बाब घबर गया क्योंकि टी ओ सर के पिता जी रूलिंग पार्टी के जिलाध्यक्ष थे। उनके जेब से निकले पैसे हजम करना आसान बात थोडी थी उसने प्राचार्य से इस संबंध में बात की तो प्राचार्य भी घबरा गए बाबू से बोले फौरन टी ओ साहब के पैसे वापस करो। हम उनसे वैर लेकर ठीक से नहीं रह सकेगे । नौकरी करना मुश्किल हो जाएगा बाबू ने कहा सर मैं भी यही सोच रहा था । बाबू ने फौरन पे टी एम से साहब के पैसे जमा कराए तथा रामकृष्ण का सारा काम बिना पैसे लिए करना शुरू कर दिया था।
यह संकुल के बीस वर्ष के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा था जब किसी का पेंशन प्रकरण मुफ्त में निरा कृत हो रहा हो।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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