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कहानी: अफसरी का उतरा भूत

राजेन्द्र कुमार एडिशनल कलेक्टर के पद से तीन साल पहले रिटायर हुए थे लेकिन उनका अफसरी का भूत पूरी तरह से अब जाकर उतरा था। रिटायरमेन्ट बाद कुछ समय तक तो वे गहरे सदमें में रहे थे। अपनी बिगड़ी हुई बोली को सुधारने में काफी समय लगा था। परिवार में एडजस्ट होने में भी उन्हें बहुत परेशानी आई थी।रिटायरमेन्ट के बाद नौकर-चाकर, सरकारी बँगला-गाड़ी सब कुछ छिन गया था। अफसरी का रुतबा पूरी तरह खत्म हो गया था। सबसे अधिक हैरत उन्हें तब हुई थी जब उनसे उस बाबू ने रिश्वत ले ली जिसकी नौकरी उनकी बदौलत लगी थी। उसने अहसान मानना तो दूर ठीक से व्यवहार तक नहीं किया था। उस दिन वे आहत होकर घर आए थे। अब वे आम आदमी की तरह रहने के आदि हो गए थे।
राजेन्द्र कुमार जी ने चौंतीस साल तक नौकरी की थी। उनकी पोस्टिंग नायब तहसीलदार के पद पर हुई थी पर प्रमोशन के जरिए वे एडिशनल कलेक्टर के पद तक पहुँचकर रिटायर हुए थे। वे एक अत्यंत साधारण गरीब परिवार से आए थे। वे खुद विद्यार्थी जीवन में अखबार बेचकर अपना खर्च निचालते थे। बी ए पास करने के बाद उन्होंने राज्य सेवा परीक्षा दी थी। तैयारी तो उन्होंने ऐसी की थी की उन्हें लग रहा था कि वे डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित होंगे लेकिन वे नायब तहसीलदार ही बन सके। तब तक तो वे ठीक-ठाक थे उनके व्यवहार में अधिक परिवर्तन नहीं आया था लेकिन जब कुछ साल बाद उनका प्रमोशन तहसीलदार के पद पर हुआ तब उनके तेवर बदलने लगे। चेहरे पर रौब ज्यादा आ गया। अधीनस्थों से व्यवहार में रूखापन आ गया और जब वे एस डी एम बने तो फिर तो उनके तैवर सातवें आसमान पर पहुँच गए। पद बड़ा होते ही रुतबा भी बढ़ा। ऊपर की आमदानी भी खूब होने लगी। वे कोई ईमानदार इंसान तो थे नहीं वे भी भ्रष्टों की बड़ी जमात में शामिल थे। एस डी एम के पद पर बने रहने के लिए हर साल उन्हें पचास लाख रुपये देना पड़ते थे। फिर अपना फायदा और अधीनस्थों का फायदा भी देखना पड़ता था। लगभग दो से तीन करोड़ रुपयों के बीच उनकी कमाई होती थी। सब में बाँटने के बाद भी उनके पास अच्छी खासी रकम बच जाती थी। उनके परिवारजनों को सिनेमा का टिकट नहीं खरीदना पड़ता था। होटल का बिल देने की कभी नौबत नहीं आती थी। कहीं जानेपर ट्रेवल एजेंसी की गाड़ी आ जाती थी। ड्राइवर सहित पेट्रोल भी उन्हें भरवाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक बड़े किसान की दुधारू गाय उनके बँगले पर बँधी रहती थी। जिसके चारे पानी की व्यवस्था वो किसान करता था। नौकर के पैसे भी वही देता था। साहब को रोज बीस बाइस लीटर शुद्ध एवं ताजा दूध निःशुल्क प्राप्त होता था। राजेन्द्र कुमार जी का पूरा दिन डाँटते फटकारते हुए बीतता था। किसी को निकम्मा तो किसी को कामचोर कहते थे। सब यस सर कहते थे और उनकी डाँट सुनते रहते थे। वैसे उनके पास काम कोई नहीं था लेकिन फुरसत जरा सी भी नहीं मिलती थी। जेब हमेशा नोटों से भरी रहती थी। उनकी पत्नी बच्चे खूब पैसा उड़ाते थे। जब वे रिटायर हुए तब उनकी पेंशन साठ हजार रुपये बनी थी। इसके अलावा उनके पास और कोई आमदनी का जरिया नहीं था। इतने पैसे तो उनका बेटा रवीन्द्र दो दिन में ही खर्च कर देता था। जब वे पूरे समय घर में रहने लगे तो कुछ दिनों में ही उनकी घरेलू नौकरानी काम छोड़कर चली गई। इस पर उनकी और पत्नी के बीच काफी बहस हुई। अंत में उन्हें हिदायत दी गई कि वे घर गृहस्थी के कामों में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करेंगे। कुछ दिनों तक सामजिक कार्यक्रमों से भी जुड़े पर वहाँ भी उन्हें महत्व नहीं मिला। उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया था। कभी सबके केन्द्र में रहनेवाले राजेन्द्र जी आजकल उपेक्षित हो गए थे। गाय वाला गाय खोलकर ले गया था। पद से हटते सबका रवैया उनके प्रति बदल गया था। आखिर एक दिन उन्होंने वो शहर छोड़ दिया तथा अपने पुश्तैनी मकान में आ गए थे। अब वे गुमनाम होकर रह रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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