पिछले साल किशनलाल ने अपने स्वर्गीय माता पिता का गया में जाकर पिण्डदान श्राद्ध तर्पण कर तिलांजलि दी थी इस हेतु उसने अपने गाँव दौलतपुर के साहूकार लालजीराम सै साठ हजार रुपये ब्याज पर कर्ज के रूप में लिए थे लालजीराम ने उस पर अहसान जताते हुए तब कहा था कि तुम गया जी जा रहे हो इसलिए पाँच फीसदी प्रतिमाह ब्याज पर कर्ज दे रहा हूँ । नहीं तो दस फीसदी से कम में मैं किसी को भी कर्ज नहीं देता कर्ज देते समय हिदायत भी दी थी जिस महीने ब्याज नहीं दिया अगले महीने उस ब्याज की राशि पर भी ब्याज देना होगा किशनलाल ने लालजी राम की शर्तें मान ली थीं आज वो साहूकार का पूरा हिसाब चुकता कर के आया था आज उसे बहुत सुकून मिला था।
साल भर पहले की बात है ।जब किशनलाल के गाँव से बीस लोगों का ग्रुप गया जी जा रहा था। उसे किसी जोशी ने बताया था कि तुम्हारे घर के पूर्वज तुमसे नाराज हैं तुम पुरखों के दिनों में गया जी में जाकर उनका पिण्डदान करके आओ तब कहीं तुम्हारी परेशानियाँ दूर होंगी । यह बात किशनलाल को भी जँची पर उसके पास इतने रुपये भी नहीं थे कि वो गया जी सके उसने अपने छोटे भाई गंगादीन से बात की तो उसने पैसे देने और गया जी जाने साफ इंकार कर दिथा था तब किशनलाल साहूकार रामजीलाल के पास कर्ज लेने आये था रामजीलाल ने भी सोचा की कर्ज देंगे तो तीन हजार रुपये का ब्याज मिलेगा। जबकि रामजी लाल खुद भी गया जी जाना चाहता था। मगर ब्याज के लोभ में उसने खुद का जाना कैंसिल कर दिया था। और लिखापडी कर के साठ हजार रुपये किशनलाल को दे दिए। किशनलाल उन पैसों से गया तो हो आए पर अब उन्हें प्रतिदिन सौ रुपये ब्याज के बचाकर रखना था ताकि महीने पर पूरा ब्याज अदा कर सके। किशनलाल सब्जी का ठेला लगाते थे उससे घर का गुजारा मुश्किल से चल रहा था। आठ महीनों तक तो वो ब्याज अदा करता रहा उसे लगने लगा था की शायद अपनी जिंदगी में वो कर्ज को नहीं अदा कर सकेगा ।पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने कर्ज मुक्ति की उम्मीद दिला दी झुमकलाल ने आम का चार पेड़ फल से लदे फसल आने तक लिए थे । अचानक झुमकलाल को अपने गाँव जाना पड़ रहा था वो चार आम के पेड़ बारह हजार रुपये किशनलाल को दे गया
वे वे पेड़ किशनलाल के लिए वरदान साबित हुए उनसे
इतना लाभ हुआ कि जो कहा नहीं जा सकता था। किशनलाल जी ने सारा कर्ज चुकता ।
उठने लगा था उस के इलाज में रामजी लाल को दो लाख रुपये खर्च करना पड़े थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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