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कहानी: किराये के मकान की दुकान

सुरेश ने एक साल पहले जो किराये के मकान में दुकान खोली थी वो अब खूब चल निकली तो मकान मालिक राजेश के मन में लोभ आ गया पहले तो उसने किराया बढ़ाया फिर उससे भी संतोष हुआ तो उसने सुरेश से वो मकान खाली करवा लिया और वो दुकान अपने बेटे को सौंप दी थी। सुरेश ने पास में ही दूसरा मकान किराये से ले लिया था परंतु उसमें दुकान खोलने की उसने गलती नहीं की थी बल्कि एक पुराना लोडिंग ऑटो खरीदकर उसी में फल सब्जी की दुकान की सेटिंग कर ली थी। उसकी यह दुकान भी उसे अच्छा मुनाफा दे रही थी। चलित दुकान खोले हुए सतीश को पूरे चार महीने हो गए थे।
साल भर पहले की बात है जब सुरेश ने मकान में सब्जी की दुकान खोली थी। वह सब्जी का ठैला लगाता था लेकिन अचानक उसे हार्ट अटेक आ गया तो तीन छल्ले उसकी हृदय की नसों में डाले गए थे। सतीश बहुत कमजोर हो गया था डॉक्टरों ने उसे भारी काम करने को मना किया था। अब वो चार क्विंटल सब्जी ठेले में भरकर उसे धकाते हुए बेच नहीं सकता था। काम धंधा करे बिना काम कैसे चलता वैसे भी बीमारी में उसकी जमा पूँजी सब खर्च हो गई थी। तभी उसके मन में विचार आया कि क्यों न वो घर में ही सब्जी की दुकान खोल ले उसका घर किराये का था जिसका वो छः हज़ार रुपये प्रतिमाह किराया देता था। बीमारी के कारण पाँच माह का किराया भी चढ़ा सुआ था। यह सोचकर सुरेश ने आगे वाले कमरे में फल सब्जी की दुकान खोल ली अब उसे ठेला धकाने की कोई जरूरत नहीं थी। वहाँ से सब्जी मंडी बहुत दूर थी जो सब्जी बेचने ठेले वाले आते थे वे चौगुने दाम पर सब्जी बेचते थे। सुरेश ने वाजिब दामों पर सब्जी बेचना शुरू किया। भाग्य ने सुरेश का साथ दिया दुकान अच्छी चल निकली सुबह आठ बजे से रात को आठ बजे तक उसे फुर्सत नहीं मिलती थी। सुरेश ने दो महीने में अगला पिछला पूरा किराया चुका दिया था। यह देखकर मकान मालिक राजेश को बड़ी हैरत हुई। एक दिन अचानक राजेश उस वक्त सुरेश के घर आया जब सुरेश दुकान बंद कर दिन भर की कमाई का हिसाब लगा रहा था। उसके सामने नोटों का ढेर लगा हुआ था। उसने पूछा क्या ये आज की बिक्री से मिली रकम है। सुरेश ने हाँ कहा तो राजेश को एक झटका लगा। उसका बड़ा बेटा सोमेश बेरोजगार था उसकी शादी हो चुकी थी। राजेश की तनख्वाह और मकान के किराये से घर का खर्च चल रहा था। राजेश के रवैये से सुरेश ने अनुमान लगा लिया था  कि अब राजेश उसे इस मकान में ज्यादा दिन नहीं रहने देगा। ठेला धकाने की उसमें ताकत नहीं थी। तभी उसे पता चला कि उसके परिचित घनश्याम अपना पुराना लोडिंग ऑटो बेच रहे हैं। क्योंकि उन्होंने नया ऑटो खरीद लिया था। सतीश को पुराना ऑटो उन्होंने बहुत कम कीमत पर दे दिया था। सुरेश ने उस ऑटो को चलित सब्जी फल की दुकान में बदल लिया था। वही हुआ जिसका सुरेश को डर था राजेश ने सुरेश को एक महीने में मकान खाली करने का नोटिस दे दिया था। सुरेश इसके लिए पहले से ही तैयार था। उसने उसी मोहल्ले में आठ घर छोड़कर किराये का मकान ले लिया था और उसमें शिफ्ट हो गया। इधर राजेश ने अपनी सब्जी फल की दुकान खोल ली थी पर वो अनुभवी नहीं था। सुरेश ने अपनी चलित दुकान नुक्कड़ पर जमा ली थी वहाँ उसकी दुकान और अच्छी चलने लगी थी। इधर राजेश की दुकान कुछ दिन तो ठीक चली बाद में सभी ग्राहक सुरेश की दुकान से सब्जी फल खरीदने लगे थे। हारकर राजेश को अपनी दुकान बंद करना पड़ी थी और वापस उसने किराये से किसी और को वो तीन कमरे दे दिए थे। अब सुरेश को दुकान खाली करने का तनाव नहीं था न उसे दुकान का किराया देना पड़ रहा था और दुकान भी अच्छी चल रही थी, इससे वो बहुत खुश था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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