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कहानी: अपनों का दिया दर्द

रवि बाबू को अपनी पुत्रवधू सरला के कारण ऐच्छिक रिटायरमेन्ट लेना पड़ा था। जबकि उनकी पूरी दस साल की नौकरी बाकी थी उन्हें सेवानिवृत हुए पूरे दस साल हो गए थे। उनके हम उम्र तथा एक साथ नौकरी पर लगे कमल बाबू पिछले महीने सेवानिवृत हुए थे। आज रवि बाबू उनसे ही मिलकर आ रहे थे। वे कह रहे थे उनकी पैंसठ हजार रूपये पेन्शन बनी है वे सेक्शन आफिसर के पद से रिटायर हुए थे आज रवि बाबू भी अगर नौकरी कर रहे होते तो वे बड़े बाबू के पद से रिटायर नहीं होते। वे भी सेक्शन ऑफिसर के पद से रिटायर हुए होते और उनको भी बाईस लाख रुपये ग्रेच्युटी के मिले होते। अभी रवि बाबू को अठ्ठाइस हजार रुपये पेन्शन मिल रही थी।  रिटायरमेन्ट के समय उन्हें बारह लाख रुपये मिले थे। जबकि कमल बाबू को सब मिलाकर पचास लाख रुपये मिले थे।
वे घर आए तो कुछ दुखी थे। पुत्रवधू सरला ने पूछा बाबूजी आज इतने दुखी क्यों हो। तब उन्होंने सरला को अपने दुख के विषय में बताया जिसकी जिम्मेदार सरला थी। सरला भी सुनकर अफसोस करने लगी। जो गलती हो गई थी उसी का नतीजा भोगना पड़ रहा था। और कुछ किया भी नहीं जा सकता था।
दस वर्ष पहले की बात है जब उनके इकलौते पुत्र नीरज की सरला से शादी हुए साल भर भी नहीं हुई थी। किसी बात पर दोनों पति पत्नी में विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि सरला मायके चली गई नीरज जब उसे लेने पहुँचा तो सरला के मायके वाले नीरज से झगड़ने लगे नीरज ने भी तैश में आकर कुछ अप्रिय बातें कह दीं। नौबत हाथापाई तक आ गई। सरला नीरज के साथ ससुराल नहीं आई। दो दिन बाद नीरज को वकील का नोटिस मिला जिसमें सरला को प्रताड़ित करने तथा दहेज लेने के आरोप लगाए गए थे। नीरज की बहन देविका तथा मम्मी उमा पर भी प्रताड़ना के आरोप लगाए गए थे। नोटिस में रवि को भी आरोपी बनाया गया था। सरला के पिता कह रहे थे देखना मैं इस रवि की नौकरी खा जाऊँगा। बहुत अभिमान है न इसे अपनी नौकरी पर। सरला ने अदालत में मुकद्दमा दायर कर दिया था। वे सभी अदालत में गए थे। वहाँ से जब पेशी करके आए तो सभी डरे सहमे हुए थे। रवि बाबू पुलिस विभाग में बड़ेबाबू के पद पर कार्यरत थे। नीरज की किराने की दुकान थी। वो अच्छी नहीं चलती थी। रवि बाबू का वेतन ही घर की आय का मुख्य जरिया था। और सरला के पिता इस जरिये को खत्म करना चाहते थे। एक दिन रात को दस बजे थाने का एक सिपाही उनके पास आया और बोला कि आपको टी आई साहब ने बुलवाया है। वे जब टी आई ए॰ के॰ चौधरी से मिले तो चौधरी जी गँभीर थे। बोले आपको आज की तारीख में रिटायरमेन्ट लेना होगा नहीं तो आपकी नौकरी तो जाएगी आपको पेंशन भी नहीं मिलेगी और सजा भी हो सकती है। पूछने पर चौधरी साहब ने उस आवेदन की कॉपी बताई जो सरला के पिता ने थाने में दिया था। उसमें दर्ज सभी आरोप झूठे थे। मगर वे उन्हें परेशानी में डाल सकते थे। चौधरी साहब बोले मैं आपको अच्छी तरह से जानता हूँ। आप जैसा सज्जन मुझे आज तक कोई नजर में नहीं आया पर मामला तो दर्ज करना पड़ेगा। एस पी साहब विवेक जी ने सुझाव दिया है कि गिरफ्तारी के पहले अगर आप रिटायर हो गए तो आपको बहुत लाभ होगा कम से कम आजीवन पेंशन तो मिलेगी। रात को ऑफिस खुला, तीन बजे रात तक काम होता रहा। वे उसी दिन की तारीख में रिटायर हो चुके थे। दूसरे दिन उनकी गिरफ्तारी हुई तब वे नौकरी छोड़ चुके थे। जज ने उनको जमानत दे दी थी। छः महीने तक केस चलता रहा। आखिर एक दिन  नीरज और सरला में सुलह हो गई परिवार परामर्श केन्द्र की समझाइश का उन पर गहरा असर पड़ा था। सरला ने अपना मुकद्दमा वापस ले लिया था। वो जब ससुराल आई तो बाबूजी उसे बहुत उदास दिखाई दिए। तनख्वा की आधी पेंशन मिल रही थी। उसमें ही घर खर्च जैसे तैसे चल रहा था। सरला को बहुत पछतावा हो रहा था। जो बाबूजी उसे अपनी बेटी से बढ़कर चाहते थे उनकी नौकरी छिनने की जिम्मेदार सरला खुद को मान रही थी। नीरज की किराने की दुकान भी अच्छी नहीं चल रही थी। सरला की हठधर्मिता ने परिवार की सारी खुशी छीन ली थी। आज जो पेंशन मिल रही थी वो पर्याप्त नहीं थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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