कृष्ण मुरारी चौबे एक सरकारी विभाग के बड़े अधिकारी के पद से दस साल पहले सेवानिवृत्त हुए थे और उन्हें आज पागलखाने में रहते हुए नौ वर्ष हो गए थे। रिटायर होने के बाद एक साल में ही उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया था। और उन्हें पागलखाने में भर्ती करना पड़ा था। तबसे अब तक वे पागलखाने में ही भर्ती थे।
कृष्ण मुरारी जब पद पर थे तब उनकी अच्छे अफ़सरों में गिनती नहीं होती थी। उनके अधीनस्थ उनसे हमेशा परेशान रहते थे। ऑफिस के चपरासी भी उनसे परेशान थे। वे सभी को बुरी तरह डाँटते थे और अपमानित भी करते थे। जरा सी गलती भी उन्हें बर्दाश्त नहीं होती थी। वे ऐसे लोगों में से थे जो ये समझते थे कि उनके बिना काम चल ही नहीं सकता, वो नहीं होंगे तो ऑफिस का भट्टा ही बैठ जाएगा। उनके अधीनस्थों में ऐसा कोई नहीं था जिसके खिलाफ उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की हो। किसी की वेतनवृद्धि रोक ली, तो किसी की तनख्वाह रोक ली और किसी को सस्पेण्ड कर दिया। वे किसी से अपनापन का भाव नहीं रखते थे। उनकी एक आदत और बहुत बुरी थी। दिन भर भले कुछ काम न करते हों पर ऑफिस बंद होने कुछ देर पहले बहुत सारा काम लेकर बैठ जाते थे। जिससे सब लोग दो घंटे देर से घर पहुँचते थे। ऐसा करने में उन्हें बहुत मज़ा आता था। कामचोर कहना तो उनकी आदत में शुमार हो गया था। हुक्म देना और दूसरों को डाँटना फटकरना उनका स्वभाव बन गया था। कृष्ण मुरारी जब रिटायर हो रहे थे तब पूरे विभाग के लोग मन ही मन खुशियाँ मना रहे थे और वे दुखी दिखाई दे रहे थे। अब कल से किस पर रौब गाँठेंगे और किसको डाँटेंगे।रिटायरमेन्ट के बाद कुछ दिन तक तो वे गुमसुम रहे फिर सब से अफसरी दिखाने लगे। उनके कारण घर में काम करने वाली दो बाई काम छोड़कर चली गईं थीं। बाजार जाते तो रोज किसी न किसी से उनका झगड़ा जरूर होता था। कृष्ण मुरारी का एक ही लड़का था - पराग, वो कंपनी में मैनेजर था वो भी अपने पापा से परेशान था। झगड़ा वे करते और मिन्नते पराग को करना पड़ती थीं। ये सब यूँ ही चल रहा था कि वे गुमसुम रहने लगे थे। फिर उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया। वे आक्रामक होने लगे थे। पराग ऑफिस से कब तक छुट्टी लेता, जब डाक्टर रविकाँत ने उन्हें पागलखाने में भर्ती करा दिया था तबसे वे पागलखाने में ही रह रहे थे।
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रचनाकर
प्रदीप कश्यप
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