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कहानी: ऐसी भी दबंगई

जगदीप राघवपुर गाँव का ऐसा दबंग था जिसके ऊपर आज तक एक भी पुलिस केस नहीं था उसके कारण राघवपुर में कोई अपराध नहीं होता था लोग घरों में ताला तक नहीं लगाते थे बहन बेटियाँ सुरक्षित थीं कोई सरकारी ठेकेदार गाँव में हुए निर्माण कार्यों में आज तक एक रुपये का भी भ्रष्टाचार नहीं कर सका था । जगदीप किसी से हफ्ता वसूल नहीं करता था बल्कि सबको ब्याज मुक्त कर्ज देता था और किसी की बेबसी देखकर कर्ज माफ भी कर देता था। आसपास के सभी गाँवों में उसका बड़ा सम्मान था ऐसा कोई नहीं था जो उसके अहसानों के बोझ से न दबा हो। जगदीप ने शादी नहीं की थी उसका कोई सगा रिश्तेदार नहीं था वो गाँव में अकेला ही रहता था साथ में कोई हथियार नहीं रखता था मगर किसी की भी मजाल नहीं थी जो उसके सामने कभी ऊँची आवाज में बात कर सके लोग उसका सम्मान ही इतना करते थे। यह सब दस वर्षों में हुआ था दस वर्ष पहले वह एक साधारण इंसान था।
बात उस समय की है जब जगदीप पढ़ने के लिए शहर गया था तीन साल में उसने बी एस सी कर ली थी और नौकरी की तलाश कर रहा था उसकी इच्छा पुलिस अधिकारी बनने की थी उसी की वो तैयारी भी कर रहा था जगदीप उस वक्त तक साधारण युवक ही था कि अचानक एक दिन उसको ख़बर मिली की उसकी माँ सुषमा और पिताजी सीताराम ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। वो तुरंत गाँव पहुँचा तो देखकर दंग रह गया उसके माता पिता का घर बार जमीन जायदाद सब पर साहूकार किशोरीलाल ने कब्जा चर लिया था दो महीने पहले एकमात्र कमरा भी छीन लिया था तबसे वे नीम के पेड़ के नीचे रह रहे थे पर उन्होंने जगदीप को इसकी भनक नहीं लगने दी थी तीन साल पहले जब वो पढ़ने के लिए शहर गया था तब सब कुछ ठीक था और आज ऐसी नौबत आ गई थी कि उनको आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा। वो माता पिता की अंत्येष्टि करने के बाद किशोरीलाल के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने पहुँचा मगर उसे ही झूठे केस में फँसाने की धमकी देकर भगा दिया गया पुलिस ने किशोरीलाल के खिलाफ रिपोर्ट नहीं लिखी थी । जगदीप ने राघवपुर छोड़ दिया था इसके बाद दो साल वो फेक्ट्री में मजदूर बनकर रहा इन दो सालों ने एक सीधे सादे इंसान को दबंग इंसान में बदल दिया था चारों तरफ उसके दुश्मन थे जिनसे जूझ जूझकर वो मजबूत हो गया था दो साल में उसने सारे गुर सीख लिए थे इसके बाद वो नौकरी छोड़कर राघवपुर आ गया था आते ही उसने किशोरीलाल को एक सौ पेज का पत्र दिया जिसमें पिताजी द्वारा लिए गए कर्ज तथा अदा की गई राशि का विवरण था किशोरीलाल ने जो राशि कर्ज में दी थी उसकी दस गुनी राशि वसंल करने के बाद भी उसने उसके माता पिता को बेघर कर दिया था जमीन छीन कर किसान से मजदूर बना दिया उसमें पूरा हिसाब लिखा था तधा पन्द्रह दिन में जमीन,वापस करने और चार सेल तक फसल से हुई आय को जोड़कर पचास लाख रुपये देने की बात भी कही और ये भी कहा कि यह पैसे भैं हराम में नहीं ले रहा हूँ इन पैसों पर मेरा हक है। पत्र पढ़कर किशोरीलाल बोला चींटी के पर निकल आए इसे भी इसके माता पिता के पास पहुँचाना पड़ेगा किशोरीलाल ने बाहर से किलर बुलवाए थे जगदीप को जान से खत्म करने के लिए पर जगदीप अब सीधा सादा जगदीप नहीं था वे उस तक पहुँचते इसके पहले बीच में ही जगदीप ने उनकी वो थुलाई कराई की वे भागते नजर आए किशोरीलाल उसकी रिपोर्ट थाने में दर्ज नहीं करा सका जगदीप ने पिटाई की पूरी विडियो बनवाई थी जिसमें वे कह रहे थे कि हमें किशोरीलाल ने जगदीप की हत्या की सुपारी देकर भेजा है। अब किशोरी लाल ने अगला कदम ये उठाया कि जगदीप का अपहरण करा लिया इसके बाद उसे प्रताड़ित करने के लिए वो उसके पास पहुँचा जगदीप आराम से कुर्सी पर बैठा हुआ था किशोरी लाल को देखकर मुस्कुराकर बोला आओ तुम्हारा ही इंतजार था किशोरीलाल को बड़ी हैरत हुई तभी उसने देखा का जिन्हें वो अपने आदमी समझ रहा था वो जगदीप के आदमी थे उल्टा किशोरीलाल का ही किडनेप हो गया था ऐसा किशोरीलाल समझ रहा था जबकि जगदीप ने उससे ऐसा कोई व्यवहार नहीं किया था उसका खूब ख्याल रखा जा रहा था जगदीप की शर्त यही थी कि उसका पैसा और जमीन लौटा दे बस बाकी कोई दुश्मनी नहीं आखिर किशोरीलाल ने जगदीप की शर्त मानने का अभिनय किया जगदीप ने सब जानते हुए भी उसे छोड़ दिया वो जानता था कि ये हद दर्जे का धूर्त इंसान हैं पंद्रह दिनों में किशोरीलाल ने हर चाल चली जगदीप उसके सारे दाँव फेल करता चला गया और उसके सारे रास्ते बंद करता चला गया इस बीच उसने एक बार भी कानून हाथ में नहीं लिया ना ही खून खराबा किया पन्द्रह दिन बाद जब जगदीप जमीन के कागजात लेने तथा अपने रुपये लेने किशोरीलाल के पास पहुँचा तब किशोरीलाल भय से थरथर काँप रहा था जबकि जगदीप निहत्था और अकेला था। आश्चर्य की बात तो ये हुई कि किशोरीलाल ने जगदीप को जमीन के कागजात भी सौंप दिए और रुपये भी हवाले कर दिए जगदीप ने वे रुपये जरूरतमंद में बिना ब्याज के कर्ज देने के लिए रख लिए किशोरीलाल अच्छी तरह समझ गया कि अब वो इस गाँव में नहीं रह सकेगा इसलिए उसने अपना सब कुछ बेचकर शहर का रुख किया जब वो जाने लगा तब जगदीप ने कहा तुम क्या समझते हो यह सब तुमने किसी और को बेचा है अरे ये सब मैंने खरीदा है और जिसे बेचा है वो कोई सेठ नहीं है सारे कागजात ठीक से देखो उसमें मेरा ही नाम दर्ज है इस बार किशोरीलाल को कोई हैरत नहीं हुई क्योंकि पूर्व में वो जगदीप की ताकत से परिचित हो चुका था। तभी से राघवपुर में जगदीप का सिक्का जमा हुआ था हैरत की बात तो ये थी कि आज तक किसी ने जगदीप को कभी किसी को थप्पड़ तक मारते नहीं देखा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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