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कहानी: अपनापन

राधेश्याम जी ने पच्चीस साल पहले जिस विधवा नीरजा से शादी की थी वो जुड़वाँ बच्चों की माँ थी आज वे दोनों बच्चे नीलेश और गीतेश उसे अपने सगे पिता से भी अधिक बढ़कर मानते थे दोनों की शादी जुड़वाँ बहनो कविता एवं सविता के साथ हुई थी दोनों बेटे कपड़े के व्यापारी थे उनकी बड़ी दुकान थी ये दुकान राधेश्याम जी ने उनको सौंप दी थी दोनों बच्चों की शादी के बाद वे अब घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए थे दोनों बेटों ने सब कुछ अच्छे से सम्हाल लिया था जो अपनापन उन्होंने अपने बच्चों को दिया था वही अपनापन उन्हें अपनी वृद्धावस्था में मिल रहा था इस से वे बड़े खुश रहते थे उनके हम उम्र उन्हें खुशनसीब समझते थे।
जब राधेश्याम जी ने नीरजा से शादी की तब उनकी उम्र पैंतालीस वर्ष की थी नीरजा चालीस वर्ष की थी उसके जुड़वाँ बेटे नीलेश गीतेश पाँच वर्ष के थे नीरजा एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी तब वे फेरी लगाकर कपड़ा बेचते थे नीरजा उनसे कपड़े खरीदती रहती थी कभी उधार भी कर लेती थी फिर किश्त में अदा भी करती रहती थी नीरजा के पति किशन टेक्सी ड्राइवर थे एक दिन वे टेक्सी लेकर रामेश्वर गए थे उनके साथ एक ही परिवार की पाँच सवारियाँ थीं जिसमें पति सोमेश उसकी पत्नी सुनीता दो व्रष की बेटी प्रभा माँ कमला और पिता कामता प्रसाद थे सोमेश को बहुत कम दिनो की की छुट्टी मिली थी इसलिए वो हर जगह जल्दी कर रहा था वे सब तो टेक्सी में सोकर नींद पूरी कर लेते थे पर किशन लगातार टेक्सी चला रहा था उसकी नींद पूरी नहीं हो रही थी उसको तेज स्पीड में टेक्सी चलाना पड़ रही थी। रात को तीन बजे उसे नींद का तेज झौंका आया और टेक्सी से उसका नियंत्रण हट गया टेक्सी दो सौ फीट गहरी खाई में गिर गई थी हादसा इतना भीषण था कि किसी की भी जान नहीं बची थी नीरजा बेवा हो गई थी दोनों बच्चे तब तीन साल के थे दो साल उसने बेवा रहते हुए बिताए थे उसमें उसे बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा था वो शादी करना चाहती थी पर उसकी उम्र चालीस वर्ष की थी और दो बच्चों की माँ भी उससे शादी करने को कोई तैयार नहीं था जब कई दिनों तक नीरजा राधेश्याम जी की उधारी के पैसे अदा नहीं कर सकी तब उसे पता चला की उसके पति नहीं हैं और घर में आर्थिक तंगी है। उसने उससे उधारी अदा करने का तकाजा करना बंद कर दिया था। राधेश्याम ने ही नीरजा की नौकरी प्राइवेट स्कूल में लगवाई थी नीरजा को धीरे धीरे यह पता चल गया कि राधेश्याम तलाकशुदा है और राधेश्याम की पत्नी सुषमा ने उसे इसलिए तलाक दे दिया था क्योंकि वो पिता बनने के योग्य नहीं था यह तब पता चला जब शादी के दस साल हो गए और उन्होंने डॉक्टरों से जाँच कराई तब सुषमा तो माँ बनने योग्य पाई गई कमी राधेश्याम में ही निकली सुषमा यह बर्दाश्त नहीं कर सकी और उसने राधेश्याम से तलाक ले लिया तलाक के समय सुषमा तीस वर्ष की थी और राधेश्याम पैंतीस वर्ष का तबसे राधेश्याम अकेला ही रह रहा था सुषमा ने तलाक लेने के बाद ओमप्रकाश से शादी कर ली थी ओम प्रकाश चाय की दुकान चलाता था शादी के बाद सुषमा बेटा विकास तथा बेटी विधिका की माँ बन गई थी राधेश्याम को तलाक लिए दस वर्ष हो गए थे । और उसने यह ख्याल पूरी तरह अपने दिल से निकाल दिया था कि उसकी शादी किसी से हो सकेगी। एक दिन नीरजा के दोनों बच्चों की तबीयत खराब हुई तब राधेश्याम ने हर संभव मद्द की दस हजार रुपये इलाज में खर्च किए ।इसने नीरजा का दिल जीत लिया । एक दिन नीरजा ने उससे कहा तलाक के बाद आपने शादी क्यों नहीं कि इस पर राधेश्याम ने कहा ऐसे इंसान से शादी कौन करेगा जो कभी पिता नहीं बन सकता यह सुनकर नीरजा बोली ऐसी बात नहीं है बहुत मिल जाएँगी ऐसी जो इसके बाद भी आपसे शादी करने को तैयार हो जाएँगी इस पर अचानक राधेश्याम के मुँह से निकल गया क्या आप मुझसे शादी कर पाएँगी। नहीं न। इस पर नीरजा ने सिर झुका लिया बोली कुछ नहीं पर राधेश्याम उसका मनोभाव समझ गए थे इस तरह नीरजा और राधेश्याम की शादी हो गई थी शादी के बाद राधेश्याम के भाग्य बदल गए थे उसकी विवादित जमीन के विवाद का निपटारा हो गया था तथा दस लाख रुपये में वो जमीन बिक गई थी इस रुपये से उसने नीलामी में नगरपालिका की दुकान ले ली थी उसका फेरी लगाकर कपड़ा बेचने का काम छूट गया था अब वह दुकानदार बन गया था दुकान मौके की थी नीरजा ओर दोनों बच्चों के भाग्य से दुकान अच्छी चल निकली थी उसके पास प्लॉट पहले से ही था दुकान की कमाई से उसने प्लॉट पर मकान बनवा लिया था जिसमें सभी सुछपूर्वक रहने लगे थे नीरजा भी बहुत खुश थी राधेश्याम ने दोनों बच्चों को बहुत लाड़ प्यार दिया था उनकी हर छोटी बड़ी इच्छा पूरी करने में कोई कसर नहीं की थी बल्कि नीरजा ही कहती थी बच्चों से इतना लाड़ करना ठीक नहीं वरना यह बिगड़ जाएँगे लेकिन राधेश्याम ऐस बात पर ध्यान नहीं देता था बच्चे भी माँ से ज्यादा राधेश्याम से जुड़े थे राधेश्याम नै जो अपनापन दिया था उसका अच्छा परिणाम निकला था दोनों बच्चे बड़े हो गए थे उन्हें पहले से ही भालूम था कि राधेश्याम उनके सगे पिता नहीं है पर बच्चों ने कभी इसका अहसास नहीं होने दिया था राधेशूयाम जी की उम्र सत्तर साल की हो गई थी दोनों बेटों ने एक दिन राधेश्याम जी से कहा पापा आपने बहुत दौड़ धूप कर ली अब हमें भी कुछ करने का अवसर दो हम आपकी सेवा करना चाहते हैं बेटों की बात सुनकर राधेश्याम जी खुश हो गए दोनों बहुओं ने भी यही बात कहकर उन्हें खुश कर दिया नीरजा को सबसे ज्यादा खुशी इस बात की हुई कि उसके दोनों बेटे राधेश्याम के प्रति खूब लगाव रख रहे हैं। 
एक दिन अपनी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर जब वे कार से अपने परिवार के साथ वृद्धाश्रम में वृद्ध जनों को उपहार देने गए तब अपनी पूर्व पत्नी सुषमा को वहाँ देख चौंक गए सुषम पैंसठ वर्ष की हो गई थी और बैशाखियों के सहारे से चल रही थी उसके पति का निधन हो गया था उसकी बेटी ने शादी के बाद उससे मुँह फेर लिया था बेटा बहू के कहने में आकर उसे वृद्धाश्रभ छोड़ गया था। सुषमा ने इतना ही कहा कि एक अच्छे इंसान का साथ छोड़ने की सजा मैं बुढ़ापे में भुगत रही हूँ और आपकी अपनी अच्छाइयों का तोहफा भिला है जिससे आपका बुढ़ापा आराम से कट रहा है। राधेश्याम सुषमा की बात सुनकर चुप रह गए और कर ही क्या सकते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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