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कहानी: विमला अम्मा

आज विमला अम्मा जनकपुर बस्ती की सबसे अधिक सम्मानित महिला हैं मगर पाँच साल पहले बस्ती वाले उन्हें संदेह भरी नज़रों से देखते थे। माँएँ अपने छोटे बच्चों को उनके सामने नहीं लाती थीं। कोई कहता उनकी नजर बहुत खराब है, कोई कहता सुबह सुबह उनका मुँह नहीं देखना चाहिए वरना पूरा दिन खराब गुजरेगा। जबकि आज स्थिति बिल्कुल उलट थी, अब तो बस्ती में किसी के यहाँ का कोई शुभ काम उनके बिना नहीं होता था।
पाँच वर्ष पूर्व जब विमला अम्मा इस बस्ती में मोगरा गाँव से रहने आईं थीं तब उन्हें रहने के लिए कमरा भी किराए से बड़ी मुश्किल से मिला था। विमला पति के देहान्त के बाद यहाँ आई थीं।
जनकपुर में चल रहे घरेलु उद्योग में वे सुबह दस बजे काम करने जातीं और शाम को पाँच बजे घर आ जाती थीं। बस्ती का कोई बालक अकेले उनके सामने से निकलने से डरता था। यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चला। एक दिन विमला जी के बगल में रहने वाली श्रीमती मीना वर्मा को अचानक पेट में तीव्र दर्द हुआ तो विमला अम्मा वहाँ पहुँच गईं। उन्होंने उस महिला के सिर पर हाथ फेरा, पेट थोड़ा दबाया तथा पानी में कोई देशी दवा घोलकर पिलाई और थोड़ी देर बाद ही महिला का दर्द छूमंतर हो गया था। किसी के यहाँ शुभ कार्यक्रम था, वहाँ विमला माँ ने पूजा की तैयारी करवाई महिला संगीत गायन भी उनका अच्छा था। वो अच्छी ढोलक बजा लेती थीं। बहुत छोटे बच्चे जिनके छूने से उनकी माँ तक डरतीं थीं उनकी मालिश वे बहुत अच्छे से करतीं। उनकी मालिश का तेल भी वे खुद बनाती थीं। नस पे नस चढ़ जाए तो उसे चुटकी बजाते ही ठीक कर देती थीं और यह सब वो निःशुल्क करतीं थीं इसलिए सबकी चहेती बनी हुई थीं। किसी ने उन्हें कभी रोते हुए नहीं देखा था। एक मधुर मुस्कान हमेशा उनके चेहरे पर खिली रहती थी। वो तो आज दोपहर वो गुमसुम बैठी थीं, रमेश की बहू ने उन्हें देखकर पूछ लिया अम्मा ऐसा कौन सा दुख है जो आप किसी को नहीं बतातीं मन ही मन में घुटती रहती हो। तब पता चला कि विमला अम्मा का इकलौता बेटा सोहन है। उसका बेटा रिंकु है आज उसका आठवाँ जन्मदिन है और उनको बुलाया तक नहीं गया है जबकि तीन साल की उम्र तक उन्होंने ही उसकी परवरिश की थी। उसकी माँ तो उसका कोई काम तक नहीं करती थी। वही पोता जब तीन वर्ष का हो गया तो उन्हें घर से निकाल दिया गया था। उनके पति की जमीन-जायदाद पर लड़के ने पहले ही अपना कब्जा कर लिया था। तभी से विमला अम्मा जनकपुर में रह रही थीं। यहाँ आकर उन्हें इस बात की बहुत खुशी है कि एक बेटा, बहू, पोता छूटा तो उसके बदले में उन्हें पूरी बस्ती के बहू, बेटे, नाती, पोते मिल गए थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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