सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: कबाड़े के भाव

पूर्व विधायक स्वर्गीय राधेलाल के दोनों बेटे हरिमोहन और जगमोहन में आज खूब तू-तू-मैं-मैं हुई थी। लोग तो यह समझ रहे थे कि हाथापाई की नौबत आने वाली है पर बात कहा-सुनी पर ही समाप्त हो गई। हुआ ये था कि जगमोहन ने पिताजी के दो बड़े बक्सों में रखी ट्राफियाँ, सम्मान पत्र, स्मृति चिन्ह आदि मात्र दस हज़ार रुपये में कबाड़ी को बेच दी थी। हरिमोहन ने पूछा कि दो बक्सों में पिताजी को दिए गए शाॅल रखे थे वो कहाँ हैं। इस पर जगमोहन ने कहा की वो तो मैं पचास रुपये नग से दुकानदार को बेच आया। पैसे कहाँ हैं- वो तो खर्च हो गए, जगमोहन बोला। इस पर हरिमोहन आग बबूला हो गया। हरिमोहन ने बोला- तूने दो लाख की शाॅल कौड़ियों के भाव बेच दी। कम से कम डेढ़ लाख के समृति चिन्ह और पीतल की मूर्तियाँ, उसमें एक चाँदी की तलवार भी थी वो सब भी मात्र दस हजार में बेच दी। इस पर जगमोहन ने कहा जब घर में खाने को अन्न का एक दाना तक न हो और जेब पूरी खाली हो तो सौ-पचास रुपये भी हजारों रुपयों के बराबर लगते हैं। हरिमोहन भी गरीबी में दिन काट रहा था। जगमोहन के पास वो भी कबाड़ को वही सामान बेचने आया था जो जगमोहन पहले से ही बेच चुका था। यही उनके झगड़े का कारण था। जब जगमोहन से उसे एक रुपया नहीं मिला तो वो दुख और निराशा में डूब गया था।
राधेलाल जी तीस साल पहले क्षेत्र के विधायक थे। वे अपने समय के बहुत जागरूक एवं चर्चित विधायक रहे थे। राधेलाल जी पूरे समय एक्टिव रहते थे। हर कार्यक्रम में शामिल होते जिसे उन्हें खूब स्मृति चिन्ह सम्मान पत्र शाॅल और श्रीफल मिलते रहते थे। जब विधायक थे तब उनके पास बहुत बड़ा बँगला था। उसमें उन्होंने वो सब करीने से सजाकर रखा था। राधेलाल कोई ईमानदार विधायक नहीं थे। वे सबसे अधिक भ्रष्ट थे और बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करते थे। अपनी विधायकी के दौर में उन्होंने दोनों हाथों से पैसा बटोरा था। उस दौर में हरिमोहन तथा जगमोहन के ठाठ ही निराले थे। दोनों भाई अपने हाथों खुलकर रुपये खर्च करते थे। दोनों के पास दोस्तों की हमेशा भीड़ लगी रहती थी। उनके पैसों पर चापलूस दोस्त मजे कर रहे थे। उनके भ्रष्टाचार के कारनामें उजागर होने लगे थे। जिससे उनकी बहुत बदनामी हो रही थी। चुनाव नजदीक आ रहे थे, राधेलाल जी ने इतना अधिक धन कमाया था जिसकी कोई गिनती नहीं थी। हाँलाँकि पार्टी ने यह बात जानते हुए भी उन्हें ही टिकट दिया था। जिसकी परैणति यह हुई कि वे बुरी तरह चुनाव हार गए थे। राधेलाल जी ने इसमें पानी की तरह पैसा बहया था फिर भी हार गए थे। जब तक राधेलाल जीवित रहे तब तक घर का खर्च आराम से चलता रहा। उन्हें पेंशन मिलती थी। दस साल पहले राधेलालजी को हार्ट अटेक आया और वे चल बसे। तब से दोनों भाईयों का दौर उलट गया था। उन्होंने जिंदगी में कभी पिता को कुछ कमाकर नहीं दिया था। उनकी मुफ्तखोरी की आदत पड़ गई थी। दोनों की शादी भी हो गई थी। राधेलाल जी के मरने के बाद धीरे-धीरे सब कुछ मिटता रहा, मकान बिका, जमीन बिकी और आखिर दोनों भाई पूरी तरह कंगाल हो गए थे। वो खाने को भी मुँहताज हो गए थे। दोनों की पत्नियाँ उनको छोड़ कर मायके में रह रही थीं।


*****

रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...