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कहानी: बाबा के टिक्कड़

बिरजा बाबा शोभापुर गाँव के पास एक कुटिया में रहते थे। ठीक दोपहर दो बजे वे एक टिक्कड़ और उसके साथ सब्जी या चटनी का प्रसाद पाते थे। चौबीस घंटे में वे इतना ही भोजन करते थे लेकिन उनके टिक्कड़ का एक टुकड़ा पाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। डेढ़ पाव आटे का टिक्कड़ बनाते थे और उसी को दो या चार लोगों में बाँटकर फिर बाकी का वे खाते थे। लेकिन आज की स्थिति में उन्होंने दो क्विंटल आटे के टिक्कड़ बनवाए थे और सब बँट गए थे। बिरजा बाबा ने आज भी सबको खिलाने के बाद आधा टिक्कड़ खाया था। और वो बड़े संतुष्ट दिखाई दे रहे थे।
बिरजा बाबा विगत बीस वर्षों से यहाँ रह रहे थे। उनकी उम्र पिच्यासी वर्ष थी। मगर कोई उन्हें देखकर यही समझता था कि बाबा की उम्र पचास से ज्यादा नहीं होगी। बिरजा बाबा कभी बीमार नहीं पड़े थे। लोग समझते बाबा के टिक्कड़ में ही ऐसा कुछ है जिस से वे स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। कई तो इसलिए भी बाबा से प्रसाद के रूप में टिक्कड़ का एक टुकड़ा लेने आते थे कि इसके खाने से वे भी बाबा जैसे निरोगी स्वस्थ और प्रसन्न चित्त रहेंगे। रोज उनके आश्रम में पाँच सौ से ऊपर लोग भरपेट भोजन करते थे। और एक हजार से अधिक लोग टिक्कड़ का एक टुकड़ा प्रसाद के रूप में पाते थे।
बिरजा बाबा के विषय में गाँव के कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि वे वैराग्य लेने के पहले मजिस्ट्रेट थे। रिटायर होने के बाद उन्हें गृहस्थ आश्रम से वैराग्य हो गया और उन्होंने घर छोड़ दिया। पाँच वर्ष तक उन्होंने भ्रमण में बिताए एक वर्ष हिमालय में बिताए और फिर शोभापुर गाँव में आकर धूनी रमा ली। कभी बाबा गाँव में भीख माँगने नहीं गए। छः महीने तक जब लोगों ने देखा कि बाबा तो प्रसन्न और स्वस्थ हैं तब उन्होंने देखा कि वे ध्यान में लीन रहते हैं। रोज ठीक बारह बजे कोई न कोई उन्हें आटा सामान का सीधा लाकर देता था। वह आटे का एक टिक्कड़ बनाते, उसे धूनी के अंगारों पर हीं सेंक लेते, सब्जी नमक मिर्च मसाले घी जो भी होता वे टिक्कड़ के आटे में मिलाकर गूँथ लेते थे और दो बजे प्रसाद पा लेते थे। रोज का यही क्रम था। वे कभी अकेले नहीं खाते थे, भोजन के समय कोई न कोई उनके साथ होता जिसे वो टिक्कड़ का प्रसाद देते थे। एक दिन भोजन प्रसादी के समय एक पथिक उनके आश्रम के पास चक्कर खाकर गिर गया। लोग उसे बाबा के पास लाए। बाबा समझ गए कि वो भूखा है उन्होंने उसे भी टिक्कड़ का भोजन प्रसाद दिया। बाबा के स्पर्श से वो होश में आ गया और भोजन करने के बाद तो बिल्कुल ही ठीक हो गया। इसकी चर्चा चारों तरफ फैल गई। तबसे उनके आश्रम में टिक्कड़ का प्रसाद ग्रहण करने वालों की भीड़ बढ़ती चली गई। व्यस्थापक भी जुट गए, स्वयंसेवक भी जुट गए, भोजन सामग्री भी उनके पास रोज पर्याप्त मात्रा में आ जाती थी। बाबा के साथ बहुत से कार्यकर्ता भी भोजन प्रसादी तैयार करते फिर सबको खिलाकर खुद भी खाते थे। बाबा किसी से भेदभाव नहीं करते थे न किसी का निरादर। सीधे सरल इतने थे कि छोटा बच्चा भी उनसे जल्दी ही हिल मिल जाता था। सभी धर्म एवं वर्ग के लोग उनको चाहते थे। उनके प्रसाद के लिए तो होड़ लगी रहती थी। बाबा ने कभी किसी से ये नहीं कहा था कि वो चमत्कारी हैं या उनके टिक्कड़ में कोई चमत्कार है। फिर भी लोग इसको सच न मानकर उन्हें चमत्कारी ही समझते थे। एक बार उनके पास एक किसान आया बोला मैंने टमाटर की फसल बोई थी फसल तैयार हुई तब तक टमाटर के भाव गिर गए। बाबा ने कहा चिंता मत कर कल से अपने खेत के टमाटर हमें दे दिया करो अस्सी रुपये किलो और हमसे नगद पैसे ले जाया करो। बाबा ने उस किसान को तबाह होने से बचा लिया था। और भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिसमें बाबा ने किसी न किसी का कल्याण किया था। यही उनकी खुशी का कारण था भीख तो वे आज भी स्वयं के लिए कभी नहीं माँगते थे। बन सके उतनी दुखी मजबूर लोगों की मदद हर रोज किया करते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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