सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: मरा हुआ साँप

एस डी एम विवेक वर्मा जी के कार के ड्राइवर मोहन लाल को मरे हुए साँप ने डँस लिया था जिसे समय पर अस्पताल तक पहुँचाकर विवेक जी ने उसकी जान बचा ली थी। उनकी तत्परता और समझदारी से जहाँ मोहनलाल की जान बची थी वहीं उनका पूरा परिवार उनका बार बार शुक्रिया अदा कर रहा था। मोहनलाल की बूढ़ी माँ उन्हें दिन रात दुआएँ दे रहीं थीं और मोहनलाल  तो होश आने के बाद एस डी एम को अधिकारी के साथ अपने सगे भाई से बढ़कर मानने लगा था। अगले माह मोहन की बिटिया की शादी होने वाली थी। मोहनलाल परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य था। घर की सारी जिम्मेदारी उसके कँधे पर थी। आज मोहनलाल को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। मोहनलाल के इलाज का सारा खर्च एस डी एम साहब ने उठाया था।
घटना कुछ इस प्रकार घटी थी कि जब एस डी एम साहब सघन जंगल के मध्य स्थित ग्राम मगजपुर का दौरा करने गए थे तथा वहाँ से लौटते समय रात कुछ ज्यादा हो गई थी। कार में वे थे और मोहनलाल गाड़ी चला रहा था। गाड़ी जंगल के बीच से गुजर रही थी गाड़ी तेज स्पीड में थी तभी सड़क पर पड़े एक नुकीले पत्थर से टकराकर बंद हो गई। मोहनलाल गाड़ी के व्हील चैक करने कार से नीचे उतरकर टाॅर्च से पहिया चेक कर रहा था, उसके पास ही एक मरा हुआ साँप पड़ा हुआ था, उसे सड़क पार करते हुए किसी वाहन ने कुचल दिया था। जिससे उसकी मौत हो गई थी। साँप के मुँह के पास मोहनलाल का पैर था। मोहनलाल चप्पल पहने हुआ था अचानक उसे उस मरे हुए साँप ने काट खाया। वो यही समझा कि किसी कीड़े ने उसे काटा है। लेकिन उसे चक्कर से आने लगे, उसका सिर ऐसा लग रहा था जैसे बहुत तेजी से घूम रहा हो। उसने साहब से इतना कहा कि साहब मुझे किसी जंगली कीड़े ने काट लिया है और बहुत तेज चक्कर आ रहे हैं। यह सुनते ही विवेक तेजी से कार से बाहर निकले उन्होंने मोहनलाल का वो पैर देखा जहाँ कीड़े ने काटा था पर ज़ख़्म देखते ही समझ गए कि मोहनलाल को साँप ने काटा है। उन्होंने आसपास देखा तो सड़क पर किसी गाड़ी से कुचला हुआ मरा साँप दिखाई दिया। वे यह जानते थे कि मरा हुआ साँप भी काट सकता था इसिलिए तो जो साँप को मारते हैं वो उसका फन सब से पहले कुचलते हैं। हालाँकि साँप के मारने पर प्रतिबंध है फिर भी आय दिन ऐसा होता रहता है। उन्होंने मोहनलाल से कुछ नहीं कहा कि उसे साँप ने काटा है। उन्होंने मोहनलाल को सहारा देकर कार की पिछली सीट पर लिटाया और खुद कार  चलाते हुए बिना एक पल गँवाए जिला चिकित्सालय पहुँचे इसके पूर्व उन्होंने सी एम ओ को फोन कर के मोहनलाल के विषय में बता दिया था। तीस किलोमीटर का खतरनाक सफर उन्होंने बारह मिनट में पूरा कर लिया था। वे जब अस्पताल पहुँचे तो डॉक्टरों की पूरी टीम वहाँ मौजूद थी। तुरंत सब मोहनलाल के उपचार में जुट गए विवेक जी ने मोहनलाल जी की पत्नी को भी सूचना दे दी थी। वो अस्पताल आई तब तक मोहन खतरे से बाहर हो गए थे। डॉक्टरों ने बताया कि अगर एस डी एम साहब तत्परता नहीं दिखाते और देर हो जाती तो हम भी इन्हें नहीं बचा पाते। यह सुनकर मोहन जी की पत्नी हाथ जोड़कर उनका आभार प्रकट करने लगी। विवेक जी की उम्र अभी महज छब्बीस साल की ही थी जबकि मोहन की पत्नी की उम्र अड़तालीस साल की थी। विवेक बोले आप मेरी माँ के समान हैं तथा मोहनलाल जी मेरे पिताजी की उम्र के हैं। मैंने तो अपना कर्तव्य निभाया है इसमें मोहनला जी का भी बड़ा योगदान है अभी कुछ दिनों पूर्व ही तो उन्होंने मुझे कार चलाना सिखाई थी। अगर मुझे कार चलाना नहीं आती तो मोहनलाल जी की जान बचाना मुश्किल हो जाती फिर भी मोहनलाल की पत्नी यही कह रही थी की आप जैसे अधिकारी मिलना दुर्लभ हैं जो अपने अधीनस्थ के प्रति इतने अधिक संवेदनशील हों। अगर आप ये समझ नहीं पाते कि मोहनलाल जी को मरे हुए साँप ने काटा है तो भी इलाज में विलंब हो जाता और इनकी जान बचाना मुश्किल हो जाता मैं आपका अहसान जिंदगी भर नहीं भूलुँगी। विवेक बोले अहसान भले भूल जाना पर मुझे ऊपना बेटा समझना मत भूलना सुनकर मोहनलाल की पत्नी की आँखों में आँसू आ गए बोलीं विवेक बेटा हमारी दो लड़कियाँ हैं तुमने बेटे की कमी पूरी कर दी यह बात सुनकर विवेक को बड़ा सुख मिला। विवेक जी दो साल पहले ही तो एस डी एम बने थे। कार चलाना उन्हें बिल्कुल नहीं आती थी पर वे कार चलाना सीखना चाहते थे। जबकि उनके साथ के अफसर यही कहते थे कि जब शासन ने ड्राइवर दिया है तो कार सीखने की जरूरत ही क्या है। यह बात विवेक जी को जमी नहीं। दूसरे दिन उन्होंने मोहनलाल जी से कार सीखना शुरू किया और मात्र दस दिन में अच्छी तरह कार चलाना सीख गए थे। इसके बाद ही यह घटना घटी जिसमें विवेक जी की ड्राइवरी काम आई थी। विवेक जी के साथी कह रहे थे अब हम भी कार चलाना सीखेंगे समय कब पलट जाए कोई कुछ नहीं कह सकता।

*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...