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कहानी: समय किसी का सगा नहीं

आज जिसका समय अच्छा चल रहा है कल उसका समय बुरे में बदल जाए ये कोई नहीं जानता। कभी नगर निगम के उपायुक्त आर के वर्मा जी ने बड़े बाबू रहे अशोक गुप्ता को बुरी तरह से लताड़ कर भगाया था उनकी एक नहीं सुनी थी। आज उन्हीं के कारण वो जेल की हवा खा रहे थे और गुप्ता जी का रुतबा बढ़ गया था।
बात उस समय की है जब अशोक गुप्ता जी निगम के जोन कार्यालय में बड़े बाबू के पद पर पदस्थ थे। उनका रिटायरमेन्ट का समय नजदीक था। उनके पेंशन सहित अन्य सभी प्रकरण का निपटारा करने की जिसकी जवाबदारी थी वो बाबू उन्हें परेशान कर रहा था। रिश्वत के पैसे भी बहुत ज्यादा माँग रहा था। इसी सिलसिले में वो उपायुक्त आर के वर्मा साहब से मिलने उनके चैंबर में गए थे। आर के वर्मा उन्हें देखते ही भड़क गए बोले तुम तो साउथ जोन कार्यालय के बड़े बाबू हो न, वे बोले जी जनाब। कैसे मिलने आए - जब वो अपनी बात कहने लगे तो उपायुक्त ने टोकते हुए उनसे कहा - अपने जोन अधिकारी से मुझसे मिलने की परमीशन लेकर आए हो। गुप्ता जी बोले नहीं सर मैं आज की छुट्टी लेकर आया हूँ परमीशन उन्होंने दी नहीं। तो फिर क्यों आए मिलने, मैं तुम्हारी एक भी बात नहीं सुनना चाहता और जोर से लताड़ कर उन्हें भगा दिया तथा कहा कि इसका स्पष्टीकरण देना होगा, इस गलती पर मैं तुम्हें सस्पेण्ड भी कर सकता हूँ। गुप्ता जी इस लताड़ से बहुत डरे सहमे हुए थे। वे डिप्रेशन में आ गए, उन्हें मनोचिकित्सक को दिखाना पड़ा। पूरे तीन महीने उनका इलाज चला वे मेडिकल अवकाश पर चले गए। उपायुक्त को नोटिस देने का अवसर ही नहीं मिला। तीन महीने बाद जिस दिन उनका रिटायरमेन्ट था उसी दिन वे फिटनेस सर्टीफिकेट लेकर पहुँचे थे। सुबह ज्वाइन हुए थे और शाम को उनकी विदाई हो गई थी। उस समय उपायुक्त आर के वर्मा अपनी भान्जी की शादी में दस दिन की छुट्टी लेकर गए थे। इसी बीच गुप्ता जी का रिटायरमेन्ट हो गया था। वर्मा जी को इसकी खबर नहीं थी। गुप्ता जी के सारे काम प्रभारी उपायुक्त राजेश तपेजा ने करा दिए थे और गुप्ता जी से एक रुपया भी नहीं लिया था। वे गुप्ता जी के बहुत करीबी थे। रिटायरमेन्ट के बाद गुता जी ने एक दैनिक समाचार पत्र के संवाददाता की नौकरी ज्वाइन कर ली थी। उधर आर के वर्मा जी के दिन बुरे आ गए थे। जो ओवरब्रिज उन्होंने बनाया था वो छः महीने में जर्जर हो गया था। उसका भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए आज गुप्ता जी उनसे मिलने के लिए आए थे। वर्मा जी समझ रहे थे कि वे अब भी उनके निगम में बड़े बाबू हैं। यही सोचकर उन्होंने गुप्ता जी को फिर से बुरी तरह से लताड़ा था। लेकिन इस बार गुप्ता जी को कोई फर्क नहीं पड़ा था। इस बार उनके पास सारे कागजात थे। जब उपायुक्त को पता चला कि वे संवाददाता की हैसियत से आए हैं तो वे सकपका गए अशोक गुप्ता ने लगातार तीन दिनों तक जो अखबार में उनके खिलाफ खबर छापी थी।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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