सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: स्पष्टीकरण

ऊजड़खेड़ा माध्यमिक शाला के शाला प्रभारी रमानाथ जी को डी पी सी सोहन राय से बहस करना बहुत मँहगा पड़ गया था। उनकी रिटायरमेन्ट के तीन महीने बचे थे। और डी पी सी ने तय कर लिया था कि मैं इनका रिटायरमेन्ट खराब कर दूँगा और उसने वो सब चालें चलना भी शुरू कर दी थीं। वो तो सौभाग्य से नव निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्ष श्री निवास उनका पढ़ाया हुआ शिष्य निकले और उन्होंने डी पी सी सोहन राय को इसका अच्छे से अहसास करा दिया कि अगर उसने रमानाथ जी को परेशान किया तो वो भी इस पद पर बना नहीं रह सकेगा और उसके भ्रष्टाचार की दबी फाईल खुलवा दी जाएगी। तब कहीं सोहन राय के तेवर नर्म पड़े थे नहीं तो पन्द्रह दिनों में वो उनसे तीन बार कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीटरण ले चुका था। जिससे रमानाथ जी मानसिक तनाव में रहने लगे थे।
डी पी सी विवाद की शुरूआत तब से हुई थी जब रमानाथ सेमलखेड़ा की माथ्यमिक शाला में पदस्थ थे। तब वहाँ के बेईमान और भ्रष्ट शाला प्रभारी रितेश ने स्कूल निधि के पूरे एक लाख रुपये गोल कर दिए थे। ये पैसे वेन्डर जन शिक्षक संकुल प्राचार्य बी आर सी सी, डीपी सी तथा खुद उसने मिलकर ठिकाने लगाए थे। जिसके कारण स्कूल में बच्चों की टाटपट्टी, चाॅक, डस्टर जैसी चीजें भी नहीं थीं। कक्षाओं में झाड़ू लगाने के लिए झाड़ू तक नहीं थी। इसकी शिकायत एक मीटिंग में उन्होंने डी पी सी से कर दी। एक चोर की शिकायत लुटेरे से बर्दाश्त नहीं हुई और उनकी सभी के सामने तीखी बहस हो गई। भ्रष्ट तो सभी थे, सबने मिलकर पैसा डकारा था इसलिए सभी रमानाथ जी के शत्रु बन गए थे। सब पॉवरफुल थे और किसी न किसी रसूखदार के चहेते भी थे। पहले तो रमानाथ जी का तबादला ऊजड़खेड़ा गाँव में किया गया। फिर वहाँ उन्हें शाला प्रभारी बनाया गया। कम बच्चे होने के कारण वहाँ शाला निधि के पचास हज़ार रपये आए थे। रमानाथ जी ने उसमें से एक रुपये भी न खुद खाए और न किसी को खाने दिए सारा रुपया स्कूल में लगा दिया। इससे सभी उनसे और अधिक ख़फ़ा हो गए थे। डी पी सी उन्हें जाल में फंसाने का मौका ढूँढ रहा था। वो रोज समय से स्कूल आते और जाते थे। अपना काम ईमानदारी से करते थे। एक दिन वे स्कूल तो आए लेकिन दिन भर काम में ऐसे व्यस्त रहे कि शिक्षक उपस्थिति पंजी पर हस्ताक्षर नहीं कर सके। उसके एक दिन पहले के एक मीटिंग के हस्ताक्षर भी वे नहीं कर सके दूसरे दिन जब वे शाला जाने के लिए निकलने वाले थे कि देखा कि मोटर सायकिल पंचर है इसके साथ ही उसमें और भी खराबी थी। ये सोचकर उन्होंने सी एल की एप्लीकेशन सुबह साढ़े नौ बजे व्हाट्स एप पर डाल दी थी। लेकिन उनकी शाला में एक चापलूस एवं चुगलखोर शिक्षक रोशन था। उसने यह बात जन शिक्षक को बताई। जन शिक्षक ने डी पी सी को सूचना दी। डी पी सी राय ने ऊजड़खेड़ा स्कूल में आकर शाला का निरीक्षण किया तथा रमनाथ जी के उपस्थिति पंजी के कॉलम में प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर आ गए। जबकि उसके पास की ही प्राथमिक शाला के शिक्षक ओमप्रकाश दस दिन से बिना कारण बताए शाला में अनुपस्थित था। पर वो सबका मुँह लगा था जनशिक्षक ने उसे फोन पर बता दिया था कि आज डी पी सी आने वाले हैं। वो समय पर शाला आ गया था और पिछले दस दिन के हस्ताक्षर उसने शिक्षक उपस्थिति पंजी पर कर दिए थे। डी पी सी उसके स्कूल में भी गया था जहाँ बढ़िया चाय नाश्ता कर के निरीक्षण पंजी में अच्छे रिमार्क लिखकर आया था। एक गाँव वाले ने कहा भी कि ये पूरे दस दिन बाद स्कूल में आए हैं। उसे डी पी सी ने सुनकर अनसुना कर दिया। जनशिक्षक ने कहा जब उपस्थिति पंजी में उनके हस्ताक्षर हैं तो तुम्हारी बात सुनकर हम उन्हें अनुपस्थित नहीं मान सकते। जबकि रमानाथ जी के विषय में तो गाँववालों ने शिक्षकों ने तथा छात्रों ने सभी ने कहा था कि सर सबसे पहले स्कूल आए थे और सबसे बाद में गए। पर डी पी सी ने उनकी एक न सुनी तथा उन्हें अनुपस्थित मानकर नोटिस जारी कर दिया था। जिसका जवाब उन्होंने दे दिया था। फिर भी उनके पास दो नोटिस और आ गए थे। उधर संकुल केन्द्र के बाबू उमेश ने रमानाथ से कहा कि सब मामला रफा दफा करा देंगे, आपका रिटायरमेन्ट भी ठीक से हो जाएगा, सारे क्लेम आपको दिलवा दिए जाएँगे आप बस सत्तर हजार रुपये दे दो। रमानाथ जी ने रुपये देने से साफ इंकार कर दिया था। जिससे वो बाबू भी उनसे नाराज हो गया था। अब सभी मिलकर उन्हें रिटायरमेन्ट से पहले सस्पेण्ड कराना चाहते थे। झूठ आपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराने की तैयारी हो गई थी। रमानाथ पूरे गाँव के चहेते और छात्रों के पसंदीदा शिक्षक थे। अधिकारियों के इस रवैये से गाँव वाले नाराज थे और उन्होंने चक्काजाम करने का मन बना लिया था। उधर पुलिस भी आ गई थी। तभी उधर से नव निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीनिवास निकले उन्होंने कार रुकवाई और गाँव वालों से बात करने लगे। उसी दौरान रमानाथ भी वहाँ आ गए। उन्हें देखते ही श्रीनिवास जी ने उनके पैर छुए और कहा गुरूजी आपने मुझे नहीं पहचाना। मैं आपका वो शिष्य हूँ जिसे आपने पहली से आठवीं तक पढ़ाया है। आपसे मैंने बहुत कुछ सीखा जो अब मेरे बहुत काम आ रहा है। रमानाथ जी बड़े खुश हुए। श्री निवास जी को सारी बातें पता चल गई थीं और फिर देखते ही देखते बाजी उलट गई। डीपीसी का लहजा बदल गया। संकुल प्राचार्य के तेवर ढीले पड़ गए और जनशिक्षक सर, सर जी कहकर बात करने लगा। श्रीनिवास जी के कारण ही उनका रिटायरमेन्ट बेदाग रहते हुए हुआ था। आज इसिलिए वे बहुत ख़ुश थे।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...