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कहानी: रिश्वत का लोभ

विकास शुक्ला जब फूड इंस्पेक्टर थे तब रिट्यरमेन्ट के तीन महीने पहले रिश्वत लेते रँगे हाथों पकड़े गए जिसका पूरे आठ साल तक अदालत में केस चला था। इतने समय तक न तो उन्हें पेन्शन मिली थी और न ही अपना फन्ड और ग्रेच्यूटी ही। यह समय उन्होंने बहुत बुरा गुजारा था। आज उन्हें सारा बकाया पैसा मिल गया था तथा पेन्शन भी निर्धारित हो गई थी। आज वे बहुत खुश थे। उनकी पत्नी ममता भी खुश दिखाई दे रही थी।
आज जब वह घर आए तो अपने बेटे नितिन और बहू नीता को देखकर चौंक गए। आठ साल तक जिसने उनकी कोई खोज ख़बर नहीं ली थी वो अचानक आज कैसे उन पर मेहरबान हो गया था। उनकी पत्नी नीता तो सारे गिले शिकवे भूलकर उनसे अच्छे से बात कर रही थी। और बेटे बहू भी खूब उनकी ख़ुशामद कर रहे थे। लेकिन विकास शुक्ल सारी बात समझ गए थे। थोड़ी देर बात करने के बाद नीता के इशारे पर नितिन मुद्दे पर आ गया। बोला पापा एक मौके का प्लॉट है उसे खरीदने के लिए पच्चीस लाख रुपये की जरूरत है। आपका तो कोई खर्च है नहीं आपको जो पैसा मिला है वो अगर हमें दे दो तो हमारा काम बन जाएगा। बेटे की बात सुनकर विकास जी को गुस्सा तो बहुत आया पर उन्होंने उसे काबू में करते हुए कहा बेटे तू चाहे इस कान से सुन या उस कान से मैं तुझे एक रुपया तक भी नहीं दूँगा। मुझे पैसे मिले यह जानकर तू आज आठ साल में मेरे पास आया है। आठ साल से कहाँ था, कभी हमारी खोज खबर भी ली। मतलबी कहीं का, यह बात सुनकर नितिन भी तैश में आ गया दोनों के बीच कहासुनी होने लगी। नितिन बोला यदि पैसे नहीं दिए तो हमारा रिश्ता खत्म। तुम्हारे मरने पर भी मैं नही आऊँगा, तुम्हारी चिता को आग कौन देगा। विवेक बोले वैसे भी तेरा होना न होना बराबर है। हमें तेरी कोई जरूरत नहीं है। नितिन गुस्से से पागल हो रहा था। नीता के चेहरे पर हताशा थी। वे जाने ही वाले थे अचानक नितिन के तेवर बदल गए बोला, बुढ्ढे रुपये तो तुझे देना होंगे, सीधे से नहीं तो टेढ़े से। वो अपने पिता पर हमला करने वाला ही था कि तभी पुलिस ने घर में प्रवेश किया और नितिन को काबू में कर लिया। विवेक जी डर के मारे थर-थर काँप रहे थे। ममता को इसका अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि नितिन पैसे के लिए इस हद तक भी जा सकता है। नीता ने जब बाजी उल्टी देखी तो उसके तेवर भी ढीले पड़ गए। नितिन और नीता पुलिस के सामने गिड़गिड़ा रहे थे महिला पुलिस ने नीता को घेर रखा था। विवेक जी के आग्रह पर पुलिस ने नितिन को छोड़ने के पहले उससे यह लिखवा कर ले लिया की वो भविष्य में कभी इधर नहीं आएगा और कभी किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डालेगा न ही धमकी देगा। अगर ऐसा कुछ किया तो तुरंत पुलिस कार्यवाही करेगी। नितिन को हारकर लिखकर देना पड़ा। नीता से भी लिखित में लिया गया। गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए गए। पुलिस को खबर तो पड़ोस में रहने वाले रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर सोहन लाल जी ने दी थी। नितिन मुँह लटकाए लौट गया था। रात के गयारह बज गए थे। उन्होंने खाना भी नहीं खाया था। विवेक जी और ममता ने ढाबे से खाना मँगाकर खाया था। विवेक जी पुराने दिनों की याद कर रहे थे जब वे खूब रिश्वत लेते थे। नितिन को जेबखर्च में खूब रुपये मिलते थे। घर में हर तरह के साधन थे। नितिन को जन्मदिन पर आठ लाख की मोटर सायकिल लेना थी। उसके लिए विवेक जी पैसा इकठ्ठा कर रहे थे। सात लाख उन्होंने जमा कर लिए थे, एक लाख रुपये उन्हें आज मिलने वाले थे।ममता ने उन्हें समझाया भी था कि आपके रिटायरमेन्ट में तीन महीने बचे हैं किसी से रिश्वत मत लेना और सीधे-सीधे तो रिश्वत लेना ही मत पर पैसे के लोभ में उन्होंने पच्चीस हजार रुपये की रिश्वत ली और पकड़ा गए। यह खबर ममता को मिली तो वो घबराते हुए थाने पहुँची, वकील को लेकर गई। देर रात को उनकी जमानत हुई। जब विवेक और ममता घर आए तो देखा कि नितिन और उसकी नव विवाहित पत्नी घर पर नहीं थे। एक पत्र छोड़ गए थे जिसमें लिखा था हम घर छोड़कर हमेशा के लिए जा रहे हैं, साथ में कुछ पैसे और जेवर ले जा रहे हैं। हम अब कभी नहीं आएँगे। विवेक जी ने देखा लॉकर खुला है, विवेक उसमें रखे पूरे पन्द्रह लाख रुपये ले गया था। उसमें सात लाख रुपये वो भी थे जो उसकी बाइक खरीदने के लिए रखे थे। ये पैसे वो थे जो रिश्वत में मिले थे। जिन्हें बैंक में जमा नहीं किया जा सकता था। इसके अलावा वे दस लाख के वे जेवर भी ले गए थे। जिन्हें विवेक जी ने बैंक के लॉकर में नहीं रखा था। उनके बैंक खाते सील कर दिए गए थे। ये आठ साल उन्होंने घोर आर्थिक संकट में बिताए थे। रोज हजारों रुपये खर्च करने वाले के पास में बीस रुपये सब्जी खरीदने के लिए भी मुश्किल से जुट पाते थे। आज वही नितिन उनके पैसे छीनने के लिए आया था। वे सोच रहे थे कि नितिन में न मानवता है और न गैरत।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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