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कहानी: भुट्टे बेचने वाला

डेम के पास मक्का के भुट्टे आग में सेंक कर बेचने वाला किशोर सिंह आजकल अच्छा लाभ कमा रहा था उसका ठेला मौके की जगह पर लगा था और यह सब हुआ था ए एस आई गिरवर सिंह के कारण वे जबसे चौकी प्रभारी बनकर आए थे तब से ही किशोरसिंह का धंधा चमक उठा था और तभी से वो खुश रहने लगा था। जबकि दो महीने पहले उससा दुखी संसार में उसे और कोई नज़र नहीं आता था । लेकिन ए एस आई गिरवर सिंह के आने से उसके दिन सुधर गए थे।
ढाई महीने पूर्व वो बीमार पड़ा था जब ठीक हुआ था तो भुट्टे का ठेला लेकर वो डेम पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ कोई और ठेला लगाकर भुटटू सेंक कर बेच रहा है उसने जब उस से कहा कि ये मेरी जगह है तुम यहाँ से हट जाओ अपना ठेला कहीं और लगाओ को उस पर उसने हेडक॔स्टेबल राकेश धनगर को बुला लिया धनगर ने उस आदमी से पैसे लेकर ठेला लगाने की अनुमति दी थी। धनगर ने आते ही दो तीन लाठी के उस पर हल्के से प्रहार किए ठेले पर लाठी फटकारते हुए सख्त लहजे में कहा कि ये क्या तेरी बपौती है जो तू इस पर हक जता रहा है सरकारी जगह है जल्दी से हट जा यहाँ से अन्यथा तेरा पूरा ठेला सामान सहित जब्त कर लूँगा राकेश धनगर की फटकार से किशोर डर गया और उसने ठेला दूसरी जगह लगा लिया यहाँ भीड़ कम थी फिर भी दोपहर तक उसकी बिक्री ठीक ही हुई थी पर राकेश धनगर को उससे जाने किस जन्म की दुश्मनी जो वो उसे देखते ही भड़क गया बोला वहाँ से भगाया तो यहाँ आ गया । यहाँ से जल्दी से हट किशोर सिंह बेबसी के कारण रुआँसा हो गया बोला बहुत गरीब आदमी हूँ साब यहाँ से मुझे मत हटाओ वरना मैं और मेरे बाल बचेचे भूखे मर जाएँगे पर धनगर उस पर तरह नहीं आया वो उसे डेम से बहुत दंर तक खदेड़ लाया तथा ऐसी जगह उसका ठेला खड़ा करवाया जिस जगह कोई नहीं आता था दोपहर बाद वो यहाँ आया था तबसे उसकी कोई बिक्री नहीं हुई थी शाम को जब वो घर की ओर चला तो उसकी जेब में दोपहर पहले तक की कमाई के दो सौ रुपये रुपये थे। उसी से वो आटा सामान सब्जी मसाले और तेल खरीद कर ले आया तब कहीं उसके घर का चूल्हा जला सुब्ह वो फिर अपना ठेला लेकर पहुँचा और मजबूर होक र उसी जगह पर फिर किशोर सिंह पहुँचा जहाँ पर धनगर ने उसे खदेड़ा था यहाँ पूरे दिन वो अपने भुटटे लेकर बैठा रहा कोई खरीदार नहीं आया दिन भर में उसके सिर्फ दो भुट्टे बिके थे जिससे वो पचास रुपये ही जुटा पाया था इन रुपयों से उसने एक किलो गेहूँ का आटा खरीदा पाव भर टमाटर खरीदे तथा। हरी मिर्च हरा धना लेकर घर आ गया उस रात सबने चटनी से रोटी खाई थी तीसर दिन वो गहरी निराशा में डूबा हुआ था उसका मन नहीं कर रहा था आज ठेला लगाने का पर पेट का सवाल था इसलिए अपना ठेला लगाकर बैठ गया ग्राहक एक भी नहीं आया उसे नींद का झौंका जरूर आया तभी किसी तेज आवाज से उसकी नींद खुल गई तो देखा कि पुलिस की वर्दी में गिरवर सिंह है। उसी ने तेज आवाज लगाई थी । गिरवर सिंह उसका बचपन का दोस्त था दोनों प्राइमरी में साथ पढ़े थे गिरवर सिंह उसके ठेले को मौके की जगह पर ले के आए तथा उसका ठेला वहाँ लगवा दिया हैड कांस्टेबिल को भी उन्हों ने अच्छी तरह हड़का दिया। उसी दिन से उसकी अच्छी बिक्री होने लगी थी। जिससे वह बहुत खुश था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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