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कहानी: दोना पत्तल

हरि काका को जब से दोना पत्तल बनाने का काम मिला था तबसे उनके दिन बदल गए हैं आज भी वे दो हजार दोना और एक हज़ार पत्तल तैयार कर देशी होटल को देकर आए थे जिसके उन्हें अच्छे दाम मिल गए थे। हरि काका की उम्र सत्तर साल की थी और उनकी पत्नी सुगन काकी की उम्र अड़सठ वर्ष की थी दोना पत्तल बनाने का काम मिल जाने से उनका गुजारा आराम स हो रहा था।
       बात दो वर्ष पूर्व की है तब उनकी माली हालत बहुत खराब थी दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो जाता था शुगन घास बेचती थी हरि काका गिने चुने घरों में दाढ़ी कटिंग बनाने जाते थे उनसे उनके हम उम्र ही कटिंग बनवाते थे इससे उन्हें दिन भर में पचास रुपये से ज्यादा नहीं मिलते पचास से साठ रुपये का घास सुगन बेच लेती थी इतने पैसों में जो रूखा सूखा मिलता उसी को खाकर दोनों अपना समय काट रहे थे तभी एक दिन उनके घर अनूप सक्सेना आए जिन्होंने हाइवे से लगा देशी होटल खोला था होटल में चूल्हे पर मिट्टी पी के बर्तनों में खाना बनता था और दोना पत्तल में परोसा जाता था मशीन से बने कागज के दोने पत्तल में वो भोजन खिलाने से बच रहे थे पर कोई उन्हें ढाक के पत्ते के पुराने तरीके से दोना पत्तल बनाने वाला नहीं मिल रहा था वे इसकी तलाश हर ओर कर रहें तभी किसी ने उन्हें हरि काका का पता दिया था हरि काका और काकी ही दोना पत्तल बनाना जानते थे वे सक्सेना जी को हाथ से बने दोना पत्तल देने को तैयार हो गए थे इसके लिए सक्सेना जी मुँहमाँगी कीमत भी दे रहे थे। आसपास और कोई बनाने वाला भी नहीं था। हरि काका का काम चल गया था पैसे जोड़कर उन्होंने चार पक्के कमरे बनवा लिए थे। बहू बेटे जो उन्हें भगवान भरोसे छोड़कर चले गए थे वे भी अब उनसे मिलने आने लगे थे हरि काका भी पुराने गिले शिकवे भुला कर बेटे को कुछ रूपये भी दे देते थे। पैसों के लोभ में बेटे ने अपने पिता को फिर से अपना लिया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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