दादी सौरम देवी पूरे दस साल बाद अपने बड़े बेटे ओम प्रकाश के पास अपने पोते उमेश की करतूत के कारण गई थी और वहाँ से अपमानित होकर लौटीं थीं उमेश उनके दो लाख रुपये रकम जेवरात तथा अन्य कीमती सामान चुरा कर चंपत हो गया था उसी सिलसिले में वे वहाँ गईं थीं उनके पैसे तो वापस मिले नहीं अपमान और सहना पड़ा उमेश ने तो उन पर हाथ तक उठा दिया उनके गाल में थप्पड़ मारे पर उनके बेटे और बहू ने न उमेश को रोका न डाँटा वे अपमानित होकर लौट आईं यह पैसे उन्होंने पाई पाई कर जोड़े थे उनकी कई वर्षों की बचत पर उनके ही पोते ने हाथ साफ कर दिया था।
सौरम देवी के पति का निधन हुए चालीस वर्ष हो गए थे तब उनका बड़ा बेटा ओम प्रकाश दस वर्ष का था छोटा बेटा दिनेश सात वर्ष का और बेटी सुरेखा चार वर्ष की थी उस समय उनकी उम्र तीस वर्ष की थी। उन्हे सभी ने कहा कि वे दूसरी शादी कर लें बच्चों को उनके मायके वाले रखने को तैयार थे पर उन्होंने दूसरी शादी नही की उनके पति श्री किशन रात में जैन धर्मशाला की चौकीदारी करते थे तथा दिन में किराने की दुकान पर काम करते थे रहने के लिए धर्मशाला में ही उनको दो कमरे दिए गए थे जिसमें वे सब रह रहे थे सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक सडक दुर्घटना में श्रीकिशन जी की मृत्यू हो गई सौरम देवी को तो कई दिनों तक होश ही नहीं आया जब होश आया तो अपने तीनों बच्चों की जिम्मेदारी का उन्हें अहसास हुआ उन्होंने अपने आप को सम्हाला उधर जैन समाज के पदाधिकारी धर्मशाला के लिए चौकीदार नियुक्त चरने के संबंध में बैठच कर रहे थे वही सौरम देवी पहुँच गईं और बोलीं चौकीदार रखने की जरूरत ही क्या है मैं हूँ तो मैं चौकीदारी क्यों नहीं कर सकती इस बात पर समाज के पदाधिकारियों में काफी देर तक विचार विमर्श होता रहा अंततः सब उन्हें चौकीदार नियुक्त करने पर सहमत हो गए सौरम बाई ने कुछ दिनों में ही यह सिद्ध कर दिया कि वो एक अच्छी चौकी दार हैं धर्मशाला के पास एक जैन मंदिर और एक शंकर मंदिर था सौरम देवी ने हार फूल तथा पूजन सामग्री की दुकान खोल ली थी उसी की आय से उन्होंने अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया लिखाया और योग्य बनाया ओमप्रकाश पुलिस में ए एस आई बन गया था छोटा बेटा दिनेश पटवारी बन गया था सुरेखा की शादी उन्होने सतीश से की थी सतीश किसान था तथा उसके पास डेरी भी थी ओम प्रकाश की शादी अमिता से हुई थी तथा दिनेश की पत्नी का नाम देवकी था शादी के थोड़े दिनों बाद उनके दोनों बेटे अलग रहने लगे थे ओम प्रकाश ग्वालियर में रह रहा था तथा दिनेश की पोस्टिंग दतिया में थी सौरमबाई ने रात दिन एक कर के खूब मेहनत कर अपने बच्चों को काबिल बनाया था पर बच्चों ने उनकी सुध नहीं ली थी जो गए वे फिर नही आए और अगर आए तो मेहमान की तरह किसी ने माँ के हाथ में अपनी कमाई का एक रुपया तक नहीं रखा जो भी आता माँ उसे रुपयों के साथ ही खाने पीने का सामान देती और भी घरेलू उपयोग की चीजें खरीद कर देतीं बेटे वे पैसे भी नहीं देते थे ये सिलसिला शुरू से ही चल रहा था ओम प्रकाश की उम्र पचास साल हो गई थी उनका लड़का उमेश अठ्ठाइस वर्ष का होकर भी बेरोजगार था न कोई काम धंधा करता न कहीं नौकरी बाप के ऊपर बोझ बना हुआ था पिछले दिनों उमेश दादी से मिलने आया था तब दादी ने कहा था कि वो अगर चाहे तो इस धर्मशाला का मैनेजर बन सकता है समिति वाले मेरी बात टालेंगे नहीं मगर उमेश ने इस पर ध्यान नहीं दिया वो दादी के पास चार दिन रहा और बिना दादी को बताए चला गया। पड़ोसियों ने बताया कि वो एक बड़ा बैग लेकर गया है इस पर सौरम देवी का माथा ठनका उन्होंने अपने घर की एक एक चीज पर नजर डाली तो पता चला कि बहुत सा सामान गायब है पेटी खोल कर देखा तो रकम जेवर के साथ दो लाख रुपये भी गायब थे बस सौ रुपये की चिल्लर बची थी सौरम देवी को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि इस तरह से उनका पोता ही उनके घर में चोरी करेगा। जो हुआ उसे झुठलाया भी तो नहीं जा सकता था वो इसी आस में गईं थीं कि उनका फेटा ओमप्रकाश उन्हें उनकी रकम जेवर और नकदी दिलवा देगा लेकिन उसने सीधे मुँह बात तक नहीं की थी। जब उन्होंने पैसे के विषय में पूछा तो उमेश झल्ला कर बोला
क्या करोगी? बुढ़ापे में पैसो का फिर बोला मेरे पास आपका एक रुपया तक नहीं है लेकिन जब दादी ने ज्यादा जोर दिया कसम खाने को कहा तब उसने दादी को पीट दिया था उन्हें दुख इस बात का था कि उनका पोता चोरी और सीनाजोरी कर रहा है और उनका बेटा पुलिस में होकर भी कुछ नहीं बोला था वे आज बहुत दुखी थीं पर उन्हें दिलासा देने वाला कोई नहीं था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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