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कहानी: अवसर चूके

राजेश आज अपने उस मित्र शिवप्रसाद से बहुत दिनों बाद मिला था जो बयालीस साल पहले उसका क्लासफेलो रहा था। आज वो सरकारी माध्यमिक स्कूल का शाला प्रभारी था और उसकी तनख्वाह एक लाख पन्द्रह हजार रुपये प्रतिमाह थी। जबकि उसकी पत्नी गिरिजा प्राथमिक शिक्षक थी जिसे साठ हज़ार रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा था। उसकी बेटी निकिता डॉक्टर थी और बेटा चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट। उनके सामने वो ख़ुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था।
राजेश जबसे उससे मिल कर आया था तभी से गुमसुम था। आज जो वो जिंदगी जी रहा था उसका वो स्वयं जिम्मेदार था। उसके पास सेकेण्ड हॅण्ड स्कूटर थी जबकि शिवप्रसाद के पास बाईस लाख रुपये की चमचमाती हाईब्रिड कार। अब तो वो उसके पासंग बराबर भी नहीं था। राजेश को चवालीस साल पहले का वो समय याद आया जब वे एक साथ हायर सेकेण्डरी में पढ़ते थे। राजेश पढ़ने में शिवप्रसाद से तेज था। हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद जब उन्होंने कॉलेज में एडमीशन लिया तब उनके सपने आइ ए एस ऑफिस्सर बनने के थे। शिवप्रसाद के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। वो पढ़ाई के साथ ही मजदूरी भी करता था। जब दोनों सेकेण्ड ईयर में पढ़ते थे तब राजेश ने शिक्षक चयन परीक्षा दी थी, उसने उस से भी कहा तो उसने जवाब दिया कि ग्रेज्युशेन करके बड़ा अधिकारी बनूँगा अगर शिक्षक बन गया तो तीन सौ रुपये महीना वेतन मिलेगा इतने कम रुपये से कैसे अच्छे से रह सकूँगा। चयन परीक्षा का रिजल्ट आ गया शिवप्रसाद का चयन हो गया था। उसकी पहली नियुक्ति शहर से साठ किलोमीटर दूर स्थित ग्राम धुराड़ा में हुई थी। इधर दो दिन पहले ही शिवप्रसाद ने सेकेण्ड इयर की वार्षिक परीक्षा का फार्म भरा था। लेकिन उसने नौकरी ज्वाइन कर ली। नौकरी करते हुए ही वो परीक्षा की तैयारी भी करता रहा था। वार्षिक परीक्षा उसने राजेश के साथ ही दी। दोनों पास भी हो गए इसके बाद दोनों ने एक साथ ही ग्रेज्यूएशन किया। ग्रेज्यूशन के बाद राजेश ने अच्छी सरकारी नौकरी की खूब तलाश की पर वो उसे नहीं मिली। उसी दौर में राजेश के मित्र ने हाईवे पर होटल खोला था। उसमें उसने राजेश को मैनेजर की पोस्ट पर रख लिया जिसका वेतन बारह सौ रुपये प्रतिमाह था तथा चाय नाश्ता और भोजन फ्री मिल रहा था। राजेश ये नौकरी पाकर बहुत खुश था। उस जमाने में बारह सौ रुपये की तनखा मिलना बहुत बड़ी बात थी। तब शिवप्रसाद का वेतन महज चार सौ रुपये प्रतिमाह था। तब राजेश शिवप्रसाद की खूब खिल्ली उड़ाता था। शिव प्रशाद की शादी गिरिजा से हुई थी तब वो चौथी तक पढ़ी थी। शिव प्रसाद ने उसकी पढ़ाई फिर शुरू करवाई। इस तरह गिरिजा ने हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास कर ली। राजेश की पत्नी शहर की थी वो पूर्व से ही हायर सेकेण्डरी पास थी। पर राजेश ने उससे नौकरी नहीं कराई थी। इस तरह दस साल बीत गए दस साल में बहुत कुछ बदल गया था। शिवप्रसाद की तनखा बढ़कर पाँच हजार रुपये हो गई थी। उधर अचानक राजेश के होटल मालिक मित्र की दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। अब उसकी पत्नी होटल की मालिक बन गई थी। उसने राजेश को नौकरी से निकाल दिया, तब राजेश ने आठ सौ रुपये महीने में एक दुकान पर मुनीम की नौकरी कर ली। इधर शिवप्रसाद ने अपनी पत्नी गिरिजा को दो सौ रुपये के अल्प वेतन में शिशु शिक्षिका बनवा दिया था। थोड़े दिन बाद गाँव में शिक्षा गारंटी स्कूल खुला तब गिरिजा पाँच सौ रुपये प्रतिमाह में  शिक्षक बन गई। बीस साल की नौकरी में शिव प्रसाद की तनखा पन्द्रह हजार रुपये हो गई थी। समय बदला गिरिजा का संविलियन हो गया और वो प्राथमिक शिक्षक, उसकी तनखा बढ़ गई थी। कुछ समय बाद दोनों पति-पत्नी को अच्छी तनखा मिलने लगी थी। दोनों ने शहर के स्कूलों में अपना तबादला करा लिया था। उसके मुकाबले राजेश की तनखा इतनी नहीं बढ़ी थी। आज की तारीख में राजेश को मुनीम के कार्य की बारह हजार रुपये महीना तनखा मिल रही थी। जबकि राजेश की पत्नी सात हजार रुपये प्रतिमाह वेतन में प्राइवेट स्कूल में प्राथमिक शिक्षक बन गई थी। राजेश ने दो बार मिला अवसर गँवा दिया था। एक खुद को मिला था दूसरा पत्नी को मिला था। कहाँ शिवप्रसाद और उसकी पत्नी को मिलाकर एक लाख पिचहत्तर हजार रुपये मिल रहे थे। जब राजेश और उसकी पत्नी को उन्नीस हजार रुपये मिल रहे थे। जिससे उनका जीवन मुश्किलों के साथ चल रहा था। राजेश के दुख का यही सबसे बड़ा कारण भी था।


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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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