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कहानी: पक्षपात

सौतेली माँ रेशम बाई के द्वारा किए गए पक्षपात से हुए अन्याय के शिकार राकेश पाँच साल में अपने सौतेले भाईयों से अधिक सक्षम और संपन्न हो गए थे। शहर में उन्होंने बहुत शानदार मकान बनवाया था। और परिवार सहित इमलिया गाँव से शहर में शिफ्ट हो गए थे। और अच्छा जीवन जी रहे थे। सब्जी मंडी आढ़त का काम उनका अच्छा चल रहा था खेती और डेरी से भी अच्छी आमदानी हो रही थी। जबकि उनके दोनों सौतैले भाई सारी संपत्ति और जमापूँजी मिटाने के बाद प्राइवेट नौकरी कर अपनी गुजर बसर कर रहे थे। आज राकेश की सौतैली माँ राकेश का मकान और वैभव देखकर ईर्ष्या की आग में जलने लगी थी। वो कुछ कहने की स्थिति मैं भी नहीं रही थी अनमनी होकर अपने घर आई थी।
राकेश जब दस साल के थे तब उनकी माँ निर्मला का कैंसर से निधन हो गया था राकेश के पिता संतोश ने दूसरी शादी कर ली थी। रेशम बाई राकेश की सौतैली माँ बनकर आ गई थी रेशम बाई का कुछ दिनों तक तो राकेश के प्रति ठीक बर्ताव रहा लेकिन जब उसके बेटे राहुल का जन्म हुआ तो उसके व्यवहार में परिवर्तन आ गया। दूसरे बेटे रितेश के जन्म के बाद उसका पूरा ध्यान अपने बच्चों की तरफ चला गया। राकेश ने हायर सेकेण्डरी तक पढ़ाई की इसके बाद वो पिता जी की दुकान पर बैठने लगे थे। राकेश की मेहनत तथा सूझबूझ से पिताजी के कारोबार में खूब बढ़ोतरी हुई जिससे उन्होंने पक्का मकान बनवा लिया। राकेश का फाइनेन्स का काम अच्छा चल रहा था उन पैसों से राकेश ने इमलिया गाँव में जो शहर से अठारह किलोमीटर दूर था पन्द्रह एकड़ जमीन खरीद ली थी। जमीन की रजिस्ट्री पिताजी के नाम की गई थी। उस जमीन से लगा हुआ घना जंगल था जहाँ बाघ का मूवमेन्ट था। लोग दिन में भी वहाँ जाने से डरते थे। जमीन काफी कम दाम में मिल गई थी। जमीन खरीद तो ली थी पर वो ऐसी ही उजड़ी पड़ी रही कोई वहाँ रहकर खेती करने को तैयार नहीं था। राकेश की शादी गाँव की लड़की सीमा से हुई थी जो पाँचवी तक पढ़ी थी। किसान परिवार से होने के कारण उसे खेती किसानी करना आती थी। सीमा के पिता हेमराज जी ने भी यही सोचकर राकेश से अपनी बेटी की शादी की थी क्योंकि उनके पास पन्द्रह एकड़ जमीन थी। भले ही उस पर खेती नहीं हो रही थी। राकेश की सौतैली माँ को वो जमीन बिल्कुल पसंद नहीं आई थी पर वो राकेश की कमाई से खरीदी गई थी इसलिए वो कुछ कह नहीं पा रही थी पर उसकी मंशा यही थी की वो जमीन बेचकर कोई और काम में वो पैसा लगा दिया जाए लेकिन उसे खरीदने के लिए कोई ग्राहक ही नहीं मिल रहा था। राकेश के दोनों सौतैले भाई बड़े हो गए थे। उनकी भी शादी हो गई थी दोनों भाई भी पिताजी के कारोबार में ही सहयोग दे रहे थे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक हार्ट अटेक आ जाने से राकेश के पिता सतीश जी की मौत हो गई। सतीश जी की मौत के बाद उनकी सारी जमीन जायदाद मकान दुकान पर रेशम बाई का कब्जा हो गया था। रेशम बाई ने राकेश को इमलिया की पन्द्रह एकड़ जमीन देकर अलग कर दिया था। बाकी सारी संपत्ति अपने दोनों बेटों को दे दी थी। राकेश इसे हरि इच्छा मान रहे थे। राकेश जी ने शहर छोड़ दिया और पत्नी तथा बच्चों के साथ खेत पर मकान बनाकर रहने लगे थे। सीमा को गाँव में रहने की आदत थी उसने खेती में राकेश जी का पूरा सहयोग दिया उसमें दो जगह नलकूप खनन कराए गए जिनमें खूब पानी निकला उनकी जमीन से लगकर प्रधानमंत्री सड़क बन गई थी। राकेश जी ने जमीन पर डेरी भी खोल ली थी। पाँच साल की अथक मेहनत ने उन्हें संपन्न और सुखी बना दिया था। जमीन पर चार नौकर उन्होंने लगा रखे थे वे ही खेती भी करते थे और डेरी भी सम्हालते थे। राकेश ने रहने के लिए उन्हें मकान बनाकर दिए थे वे सब ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे। राकेश जी मंडी में सब्जी लेकर बेचने जाते थे वहीं वे सब्जी की आढ़त करने लगे थे। जरूरतमंदों को कर्ज भी देते थे। जिससे उन्हें अच्छी आय हो रही थी। तभी वे शहर में छः हजार वर्गफीट में फैला अपना शानदार मकान बनाया था और शहर में ही रहने लगे थे।

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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप

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