कहानी: कहानीकार की मौत के बाद
लखनलाल हिनोतिया कस्बे के मिस्त्री थे इसके साथ ही अच्छे कहानीकार भी। पूरे जिंदगी भर उन्हें कहानीकार के रूप में कभी पहचान नहीं मिली। कुछ छंदमुक्त कविताएँ जो उन्होंने लिखी थीं उनको लेकर कभी कभार कविगोष्ठियों में चले जाते थे। उनके निधन के तीन वर्ष बाद उनके बेटे शेखर तथा पत्नी सरिता को उनकी एक कहानी की जो रायल्टी मिली उससे उनकी जीवन भर की गरीबी दूर हो गई। उन्हें पूरे दस करोड़ रुपये मिले थे जिसे पाकर दोनों माँ बेटों की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ गए थे।
असल में हुआ ये था कि लखनलाल जी की एक कहानी लोकल मेगजीन मुखर वाणी में दस वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी। जिसका पारिश्रमिक उन्हें कुछ नहीं मिला था। वे यही सोचकर ख़ुश थे कि कम से कम कहानी तो प्रकाशित हुई ये भी कम नहीं था। बाद में वो पत्रिका भी बंद हो गई थी। उस पत्रिका का वो अंक जो रद्दी में बेचा गया था वो किसी तरह फिल्म निर्माता निर्देशक नवरतन जी को मिल गया। उसमें उन्होंने लखनलाल जी की कहानी पढ़ी पढ़कर वे मंत्र मुग्ध हो गए। जैसी कहानी की वे खोज में थे वैसी ही कहानी लखनलाल की मैगजीन में छपी थी। उसमें लेखक का नाम तो था लेकिन पता और मोबाइल नंबर नहीं था। फिल्म वो जल्दी शुरू करना चाहते थे इसलिए उन्होंने कहानीकार की कोई खोज खबर नहीं ली। पिक्चर आठ महीने में तैयार हो गई थी। रिलीज होने के बाद उसकी दमदार कहानी ने उसे बॉक्स ऑफिस पर सुपर हिट बना दिया। शेखर के पास भी उस पत्रिका का अंक था। फिल्म की कहानी हूबहू वही थी। वो चुप नहीं बैठा वो इस को मीडिया में ले गया। मीडिया ने उसे खूब उछाला। नवरतन जी एक दिन शेखर के झोपड़ीनुमा घर में आए और उसे दस करोड़ रुपये देकर कॉपीराइट ले लिया। इतने सारे पैसे उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखे थे। लखनलाल जो मिस्त्री का काम करते थे उससे उन्हें एक दिन के मात्र पाँच सौ रुपये मिलते थे। जिसने उन्हें और उनके परिवार को दो वक्त का अत्यंत साधारण खाना मिलता था। साहित्य से उनकी आज तक कोई आय नहीं हुई थी। वे जीवनभर मिस्त्री का काम करते रहे थे। बड़ा होकर उनका लड़का शेखर भी मिस्त्री का काम करने लगा था। तीन वर्ष पूर्व जब वे एक मकान में मिस्त्री का काम कर रहे थे तब उन्हें अचानक हार्ट अटेक आ गया और उनकी वहीं मौत हो गई थी। तबसे शेखर की कमाई से ही घर का खर्च चल रहा था। ये रुपये तो उनको अप्रत्याशित रूप से मिले थे। इसके बाद उनकी सारी कहानियाँ ढूँढी जा रहीं थीं। मरने के तीन साल बाद लखनलाल के सृजन को पहचान मिली थी। उनकी कहानियों पर धाराविक बन रहे थे, फिल्म बन रहीं थी, नाटकों का मंचन हो रहा था। लोग बता रहे थे कि आगामी दो महीने में शेखर हमारे कस्बे का सबसे अमीर आदमी बन जाएगा। और भी कई उनकी कहानियों के कॉपीराइट लेने के लिए इच्छुक थे। ऑफर भी अच्छे आ रहे थे। शेखर और सरिता को इसी बात का दुख था कि आज अगर वे जीवित होते तो कितने खुश होते।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें