सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: बेक़सूर

शासकीय प्राथमिक शाला बिसनखेड़ी ग्राम के दलित शिक्षक घीसीलाल जी पर झूठे आरोप लगाकर उनकी बेरहमी से पिटाई करने वाले गाँव के पन्द्रह दबंगों को कड़ी सज़ा मिली थी और वे सब जेल की हवा खा रहे थे इसका पूरे गाँव पर असर पड़ा था घीसीलाल जी की जान पर खतरा को ध्यान में रख उनका तबादला शहर के स्कूल में कर दिया गया था जहाँ उन से कोई भेदभाव नहीं किया जाता था वह अब बड़े खुश थे बिसन खेड़ी के डर और आतंक से उन्हें मुक्ति मिल गई थी।
घीसीलाल जी पाँच साल पहले इस गाँव में प्राथमिक शिक्षक बनकर आए थे । वे एक ईमानदार और अच्छे शिक्षक थे बच्चों को पढ़ाते भी अच्छा थे लेकिन उनका दलित होना गाँव वालों को सहन नहीं हो पा रहा था गाँव उँची कही जाने वाली जाति के लोगों का था वे सब दबंग थे किसी दलित का शिक्षक होना वे सहन नहीं कर पा रहे थे साल भर तक को किसी को उनकी जाति के विषय में ज्यादा जानकारी नहीं थी वो तो उसी गाँव के रहने वाले एक शिक्षक ओम प्रकाश जो दबंगों की जाति से थे वो खुद उस स्कूल में आना चाहते थे जो घीसीलाल जी को हटाए बिना संभव नहीं था स्कूल में एक मेडम प्रियंचा भी पदस्थ थीं वे दलित नहीं थी इससे गाँव वालों को उनसे कोई एतराज नहीं था शाला प्रभारी घीसीलाल जी थे। गाँव वाले उनका बिल्कुल सम्मान नहीं करते थे। दो साल पहले स्कूल में जन सहयोग से टी वी खरीदा जाना था मगर किसी ने भी उन्हें एक रुपया तक नहीं दिया था वे खुद अपने वेतन से टी वी खरीद कर लाए थे लेकिन उन्होंने धनराशि देने वालों की सूची में कई ग्रामीणों के नाम लिखे थे। उन्हें तो अपनी नौकरी 
करना थी इसके अलावा उनके पास आय का दूसरा जरिया भी नही था। एक दिन की बात है मेडम सी एल पर थीं घीसीलाल जी बच्चों को पढ़ा रहे थे कुछ बच्चे बहुत शोर कर रहे थे सर ने उन बच्चों को शोर करने से मना किया फिर भी जब शोर बंद नहीं हुआ तो उन्होंने तेज स्वर में बच्चों को शोर करने से मना किया बच्चों ने इसी बात पर नाराज होकर अपने माता पिता चो बुलाकर घीसीलाल जी को सबक सिखाने का विचार किया वे सब स्कूल से बाहर निकले सबने अपने माता पिता से यही कहा कि घीसीलाल सर ने उन्हें मारा है इसी बात पर गाँव के बहुत सारे लोग स्कूल आ गए गाँव वालों ने घीसीलाल जी को अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया तथा उनकी बेरहमीं से पिटाई कर दी। वे उनको पीट कर यह कहते हुए गए कि जितना जल्दी हो सके उतनी जल्दी अपना तबादला करा लो अन्यथा यहाँ रहना मुश्किल हो जाएगा । घीसी लाल जी की बहुत ज्यादा पिटाई हुई थी। उन्होंने जैसे तैसे खुद को सँभाला और शूयामनगर थाने में रिपोर्ट लिखाने पहुँचे पुलिस ने उनका मेडिकल कराया तथा आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट लिखी। स्कूल में दो दिन पहले ही घीसीलाल जी ने सी सी टीवी कैमरा लगवाया था जिसका पता गाँव वालों को नहीं था घीसीलाल जी ने पुलिस केमरे के फुटेज दिखाए जिसमें आरोपी बेरहमी से सर को पीट रहे थे तथा उनकी जाति का उल्लेख कर अपमानित कर रहे थे। पुलिस ने उनसे कहा इस बात को गुप्त रखना आगे और भी घटना हो सकती है तब इसकी यह जानकारी समझ में आएगी। पुलिस ने आरोपियों को गिर्फ्तार कर लिया था। इस से गाँव वाले और ज्यादा नाराज हो गए थे। दूसरे दिन जब घीसीलाल जी स्कूल 
आए तो सबसे पहले उन्होंने पूरे स्कूल की झाड़ू लगाई बच्चों से वे झाढ़ू लगवा नहीं सकते थे । उन पर कार्रवाई हो सचती थी लेकिन गाँव वालों ने स्कूल की छोटी बच्ची के हाथ में झाड़ू दी था झाडू लगाती बच्ची का फोटो खींच लिया फिर जिला मुख्यालय पर जाकर वो फोटो बड़े अघिकारी को बताए। तथा घीसीलाल जी को जेल मेःडालने नौकरी से हटाने की माँग की। गाँव वालों ने चक्का जाम कर दिया पुलिस ने बड़ी मुश्मिल से यह सब समाप्त कराया सी सी टीवी में सब कूछ कैद हो गया था इस आधार पर पुलिस ने गाँव वालों को अरेस्ट कर लिया था तब गाँव वालों को पता चले कि स्कूल में सी सी टी वी कैमरा लगा है । सारे सबूत गाँव वालों के खिलाफ थे इसिलिए ही उन्हें ये सजा मिली थी ।


******
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...