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कहानी: दरियादिल

ग्राम बारह खेड़ी के पटेल हरसुखलाल जब बाइस साल के थे तब उन्हें पटेली  मिली थी ये पटेली कोई उन्हें विरासत में नहीं मिली थी  बल्कि उनकी सादगी और सीधे सरल व्यवहार के कारण मिली थी गाँव में कोई ऐसा नहीं था जो उनके अहसानों के बोझ के नीचे न दबा हो वो हद दर्जे के भले आदमी थे इस समय उनकी उम्र बासठ साल की होने जा रही थी मगर अब भी वे युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक में लोकप्रिय और सम्मानित थे ग्राम में आज तक कोई सरपंच  उनके समर्थन के बिना नहीं चुना गया था उनके होने से बारह खेड़ी गाँव आसपास के सौ गाँवों के बीच सबसे संपन्न  और विकसित गाँव था। आज उनके जन्मदिवस पर  प्रदेश स्तरीय पंचायत सम्मेलन का आयोजन हुआ था और सबसे बड़ा स्नेहभोज भी जिसमें दो लाख लोगों ने भोजन किया था। पर इसके बाद भी उनकी सादगी और सरलता वैसी ही थी उनकी नजर में सब वी आई पी थे उनकी यही विशेषता उन्हें सबसे लोकप्रिय बनाती थी । 
जब  हर सुख लाल जी  अठारह वर्ष के थे तब उनके पिताजी  मनसुखलाल जी का निधन हो गया था उनके पास कुल साढ़े चार एकड़ जमीन थी उनके बड़े भाई रामसुखलाल की शादी हो गई थी और वे खेती करते थे हरसुखलाल जी की दरियादिल की तब एक मिसाल सामने आई जब उन्होंने उस जमीन पर से अपना हिस्सा छोड़ दिया पूरी जमीन पटवारी से मिलकर अपने बड़े भाई रामसुखलाल जी के नाम करा दी उस समय लोगों ने उन्हें खूब भड़काया । ये क्या कर रहे हो ? ऐसा कौन करता है? पछताओगे। आजकल कोई किसी का सगा नहीं होता कुछ कथित समझदारों ने तो उन्हें सबसे बड़ा मूर्ख साबित कर दिया था । पर हरसुखलाल जी के चेहर की सरलता वैसी  ही बरकरार थी हरसुखलाल  जमीन भाई को सौंप कर तथा माताजी को भी भाई के पास छोड़कर बरेली शहर में आ गए थे।  वहाँ उन्होंने सेठ ओमप्रकाश के यहाँ नौकरी की वे गल्ला व्यापारी थे  ओमप्रकाश जी काम करने की तनख्वाह तो देते ही थे इसके अलावा यदि उनका कोई  नौकर उनको मुनाफा दिलवाता था तो  वे उसमें से कुछ हिस्सा अपने नौकर को भी देते थे हरसुखलाल ऐसे एक मात्र नौकर थे जो हर माह वेतन से ज्यादा मुनाफा कमा लेते थे  सेठ के  कई और नौकर  उनसे इसी बात को लेकर ईर्ष्या भी करते थे पर वो उस मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा अपने साथियों को भी देते थे जिससे उनके साथियों का ईर्ष्या भाव खत्म हो जाता था  वे अकेले थे जो सेठजी की दुकान में रात को सोते थे सेठजी  उन्हें दुकान की चौकीदारी के लिए अलग से पैसे देते थे हरसुखलाल जी निर्व्यसनी थे  इसलिए उनके पास पैसा बचता था  एक बार की बात बरेली  के पास एक किसान माँगीलाल  का दस एकड़ का खेत था उस साल पानी कम बरसा था  वो  समय पर बौनी नहीं कर पाया था उसका खेत खाली पड़ा था जिन किसानों ने  बौनी कर दी थी उनकी भी  फसलें सूख रही थीं  माँगीलाल सेठ ओमप्रकाश से ब्याज पर रुपये उधार लेने आया था ओमप्रकाश जी ने कर्ज देने से मना कर दिया था।  कहा था जब तेरा खेत खाली पड़ा है तो तू  कर्ज अदा कैसे करेगा तुझसे तो ब्याज ही नहीं भरा जाएगा माँगीलाल खूब गिड़गिड़ाया   पर ओमप्रकाश का दिल नहीं पसीजा वो निराश होकर जा ही रहा था  कि  हरसुखलाल जी को उसपर तरस आ गया  वे बोले कितने रुपये चाहिए  माँगीलाल बोला दस हजार रुपये की जरूरत थी बहू को बच्चा होने वाला है उसके जापे और इलाज में रुपयों की जरूरत है कोई घर में इतनी कीमती रकम भी नहीं है  जो  गिरवी रखकर या बेचकर रुपये जुटा सकूँ हरसुखलाल बोले  मैं तुम्हें रुपये दे सकता हूँ और तुम्हें ये अदा भी नहीं करने पड़ेंगे  माँगीलाल बोला क्यों गरीब से मजाक कर रहे हो जब इतने बड़े सेठ ने सौ रुपये तक का उधार नहीं दिया तो तुम दस हजार रुपये कहाँ से दोगे हरसुखलाल बोले तुम्हारा जो खेत है सुनकर बीच में ही माँगीलाल वो खेत खाली है उसे मैं बेच नहीं सकता  क्योंकि उसके अलावा मेरे पास कमाई का दूसरा जरिया नहीं है हरसुखलाल बोले  मैं बेचने की नहीं कह रहा हूँ उसे एक फसल के लिए मुनाफे पर दे दो माँगीलाल बोला अब कौन लेगा उसे बौनी का समय निकल गया  ये वो दौर था जब गेहूँ का भाव सौ रुपये क्लिंटल तथा सोयाबीन दो सौ रुपये क्विंटल बिकती थी । सस्ता जमाना था  हरसुखलाल बोले मुझे दे दो पाँच महीने के लिए अगली फसल  की बौनी पर वापस कर दूँगा  माँगीलाल बोला क्यों मजाक पर मजाक कर रहे हो  पर हरसुखलाल जी के चेहरे पर गँभीरता थी एक उन्नीस वर्ष के युवक  की यह बात माँगीलाल जैसे पचास वर्षीय अनुभवी और पके इंसान को बचकानी लगी पर उसे तो रुपया चाहिए था उसने पक्की लिखा पढ़ी कराकर पाँच महीने के लिए अपना खेत  हरसुखलाल जी को दे दिया दो गवाहों के दस्तखत भी करा लिए  ताकी किसी सूरत में पैसे वापस न करना पड़ें और रुपये लेकर खुशी खुशी चला गया पूरे शहर में यह खबर फैल गई सब इसे हरसुखलाल की मूर्खता कह रहे थे जिस खेत को कोई पाँच सौ रुपये के मुनाफे में न ले उसको हरसुखलाल ने दस हजार रुपये में ले ली जब यह बात सेठ ओमप्रकाश जी को पता चली तो उन्होंने कहा बेटा तूने ये क्या कर दिया इतनी मेहनत की कमाई को कोई ऐसे मिट्टी में फैंकता है क्या। मुझे दे देता मैं तुझे हर महीने उस पर डेढ़ परसेंट ब्याज देता उस खेत से तुझे क्या मिलेगा पर हरसुखलाल  की सरलता वैसी ही बनी रही भोलेपन से बोले मुझे तो एक जरूरतमंद की मदद करना थी वो कर दी  अब चाहे उस खेत से मुझे एक धेला भी न मिले मुझे इसका कोई मलाल नहीं रहेगा दूसरे दिन हरसुखलाल उस खेत में बक्खर चलवा रहे थे  खेत पर बक्खर चलवा कर वे फुर्सत हुए ही थे कि, कहते हैं धर्म की जड़ पाताल में होती है जो भला करता है उसका भला जरूर होता है उस दिन शाम को खूब पानी बरसा पूरा खेत तरबतर हो गया इसके बाद फिर दो दिन धूप निकली बतर आने पर हरसुखलाल जी ने उसमें अजवाइन बो दी  पिछले साल बहुत किसानों ने अजवाइन बोई थी लेकिन उस साल पानी ज्यादा बरसने से अजवाइन की फसल नष्ट हो गई थी लोगों का बीज ही नहीं निकला था तो लागत की बात ही अलग थी  इस बार हरसुखलाल जी के खेत में ही अजवाईन की बौनी हुई थी  समय गुजरता गया इस वर्ष पानी बहुत कम बरसा था सबकी फसलें सूख गई थीं सोयाबीन की फसल चौपट हो गई थी हर जगह त्राहि त्राहि मच गई मगर हरसुखलाल का अजवाइन का खेत लहलहा रहा था दस एकड़ खेत में एक सौ एक क्विंटल अजवाइन हुई थी बाजार में उस वर्ष अजवाईन के भाव बहुत अच्छे थे हरसुखलाल जी को फसल बेचने पर एक लाख अठारह हजार रुपये मिले थे। सेठ ओमप्रकाश जी के तो होश उड़ गए थे कुछ लोग कह रहे थे कि यह हरसुखलाल जी की नेकी का फल है पाँच महीने बाद उन्होंने  वो खेत माँगीलाल जी को लौटा दिया  हरसुखलाल जी को लागत निकाल कर एक लाख पाँच हजार रुपये का मुनाफा हुआ था वो सारा रुपया हरसुखलाल जी ने मूँगफली की फसल खरीदने में लगा दिया था और एक गोदाम में सारी मूँगफली खरीद ली थीं उस साल मूँगफली की फसल बहुत अच्छी हुई थी और उसके भाव बहुत ही कम थे ओमप्रकाश जी भी मूँगफली कम ही खरीद रहे थे हरसुखलाल से बोले बेटा हमें तीस साल का अनुभव है तुम अभी बच्चे हो  खेती करना अलग बात है और व्यापार करना अलग बात है देखना आगे मूँगफली के और दाम गिरेंगे और तुम कहीं के नहीं रहोगे पर हरसुखलाल की सरलता  और सहजता  ओमप्रकाश जी को खूब खटकी । लेकिन हुआ उल्टा छः महीने बाद  मूँगफली के दाम पाँच गुना ज्यादा बढ़ गए थे  हरसुखलाल रातों रात मालामाल हो गए सेठ ओमप्रकाश जी को इतना नुक्सान हुआ था कि  वो लगभग कंगाल हो गए थे उन्होंने हरसुखलाल को बुलाया और कहा बेटा आज मैं तेरे आगे बहुत छोटा हो गया तू कितना सरल है इतना रुपया कमाने के बाद भी तू मेरे यहाँ पाँच सौ रुपये महीने की नौकरी कर रहा है और सायकिल चला रहा है फिर धीरे से बोले  तुझे मैंने इसलिए नौकरी पर रखा था  क्योंकि तू बारहखेड़ी गाँव का रहने वाला था वहाँ मेरी चालीस एकड़ जमीन है जो सबसे उपजाऊ है मगर हमें उससे कोई लाभ नहीं होता मैं उस जमीन को बेचना चाहता हूँ। सुनकर हरसुखलाल बोले आप कितने में बेचना चाहते हैं ओमप्रकाश बोले बाजार भाव तो बारह हजार रुपये एकड़ है लेकिन तुझे मैं उससे कम में भी बेच सकता हूँ हरसुखलाल बोले कम में मत बेचो मैं आपको  उसके पन्द्रह हजार रुपये एकड़ के दाम दूँगा ओमप्रकाश जी को हरसुखलाल जी की बात पर विश्वास नहीं हुआ वे तो उसे आठ हजार रुपये एकड़ तक में देने को तैयार होने वाले थे और हरसुखलाल उससे दुगुना दे रहे थे ओमप्रकाश जी ने अपने जीवन में उनसा सीधा सरल इंसान दूसरा नहीं देखा था वे अवाक होकर हरसुखलाल का मुँह ताकने लगे वो उनके बच्चों से भी उम्र में छोटे थे महज बाइस साल के  हरसुखलाल बोले सेठजी हम तो गाँव के आदमी हैं खेत खलिहान हमें अच्छे लगते हैं इस शहर में  चार साल रहा हूँ मैं और यहाँ मेरा दम घुटता है आप अपनी जमीन बेचकर  मुझपर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं । आपकी जमीन खरीदने के बाद मैं हमेशा के लिए ये शहर छोड़ दूँगा ओमप्रकाश जी ने  पूरे रुपये लेकर जमीन की रजिस्ट्री  हरसुखलाल के नाम कर दी हरसुखलाल के  रुपयों ने उन्हें दीवालिया होने से बचा लिया था । हरसुखलाल  चार साल बाद अपने गाँव बारह खेड़ी  आ गए थे  उनकी जमीन गाँव से लगी हुई थी उस पर हवेली बनी हुई थी वो हवेली भी इसके साथ ही हरसुखलाल जी को मिल गई थी यह बात तिरतालीस साल पुरानी थी हरसुखलाल जी ने खेती के लिए ट्रेक्टर खरीदा उस दौर में ट्रेक्टर खरीदना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी । दूर दूर से लोग हरसुखलाल जी का ट्रेक्टर देखने आए थे । एक दिन हरसुखलाल अपने भाई के घर पहुँचे तो भाई की दशा देखकर उन्हें तरस आ गया भाई की पूरी सारे चार एकड़ जमीन गिरवी रखी  थी और भाई  मजदूरी कर रहा था भाभी भी मजदूरी करने लगी थीं हरसुखलाल जी ने भाई का पूरा कर्ज अदा किया ब्याज चुकाया जमीन मुक्त कराई  और कुछ रुपये अलग से भी दिए  रामसुखलाल जी का मुरझाया चेहरा ऐसा खिल गया जैसे सूखते हुए  पौधे पर पानी सींचने पर उसके फूल खिल जाते हैं । एक दिन की बात है बारह खेड़ी ग्राम के पटेल जीवनलाल जी का निधन हो गया था पटेल का पद खाली था वे निस्संतान मरे थे गाँव की बैठक इस संबंध में गाँव के पीपल चौक में आयोजित थी उसमें हरसुखलाल जी को भी बैठक में बुलाया गया था बैठक में यह तय हुआ था कि जो  ग्राम के मंदिर निर्माण हेतु सबसे अधिक रुपये देगा  उसे गाँव का पटेल बनाया जाएगा बैठक को संबोधित करते हुए गाँव के पढ़े लिखे युवक दिनेश ने कहा मंदिर की लागत एक लाख रुपये आ रही है  यह सुनकर हरसुखलाल बोले पटेल आप चाहे किसी और को बना दो पर मैं अपनी ओर से मंदिर के निर्माण के लिए सवा लाख रुपये दे रहा हूँ सवा लाख रुपये तिरतालीस साल पहले बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी उनके दान के बाद फिर किसी से दान लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी जिसने जो मन से चाहा वो दे दिया वो भी ले लिया पर वो राशि ऊँट के मुँह में जीरे के बघार जैसी थी मंदिर इतना भव्य बना था जैसा आसपास के सौ गाँवों में भी नहीं था। हरसुखलाल जी तभी से गाँव के पटेल थे इन तिरतालीस सालों में कितने ही सरपंच बदल गए थे पर पटेली अब भी हरसुखलाल जी के पास ही थी अब भी उन से बड़ा दानी कोई नहीं था आज भी वे उस क्षेत्र के सबसे सीधे सरल भोले और सज्जन इंसान थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

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