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कहानी: मुफ्त की तनख्वाह

शहर से दस किलोमीटर दूर स्थित ग्राम सेमल खेंड़ा हायर सेकेण्डरी स्कूल में पदस्थ छः शिक्षक पिछले पाँच सालों से मुफ्त की तन ख्वाह ले रहे थे फिर भी उनके छात्रों का परीक्षा परिणाम शत प्रतिशत आ रहा था उनमें से एक शिउक्षक रामकिशन वर्मा तो इस आधार पर प्रदेश का सर्वोच्च सम्मान भी ले चुके थे। विद्यालय अच्छा इसलिए चल रहा था क्योंकि उसके प्राचार्य शिवशंकर जी एक ईमानदार कर्मठ और अत्यंत सज्जन इंसान थे पूरे सेमल खेड़ा गाँव तथा आसपास के पच्चीस गाँवों के लोग उनका बहुत ज्यादा सम्मान करते थे वे एक रुतबे वाले संपन्न परिवार के होकर भी सहज सरल ह्रदय के व्यक्ति थे।
शिवशंकर जी सेमलखेड़ा ग्राम के मूल निवासी थे उनके छोटे भाई चंद्र शेखर गाँव के सरपंच थे चाचा ओम प्रकाश जिला पंचायत अध्यक्ष थे उनकी पास खुद की पेतृक अस्सी एकड़ जमीन थी बैंक में सत्तर करोड़ रुपये जमा थे करोड़ों रुपये का इन्वेस्टमेन्ट था आकाश बिल्डर की कंपनी में लगभग सारा पैसा उनका लगा हौआ था पर वे अत्यंत सादगी से रहते थे। वे सरकारी स्कूल के प्राचार्य थे और दिन के बारह घंटे स्कूल में व्यतीत करते थे उनका स्कूल सबसे अच्छा और सुयव्वस्थित स्कूल था उनको डेढ लाख रुपये महीना वेतन मिलता था और वे स्कूल पर पाँच लाख रुपया महीना खर्च कर देते थे इसके कारण स्कूल में बच्चों की संख्या अच्छी खासी थी। पाँच साल पहले जब वे इस स्कूल के प्राचार्य बने थे तब यह स्कूल आज की तरह का आदर्श स्कूल नहीं था फिर भी स्कूल ठीक ठाक चल रहा था पाँच साल पहले गाँव में पक्की सड़क बनने से उनके स्कंल में वे शिक्षक आ गए जिनका पढ़ाई से कोई लेना देना नही था क्योंकि उन्हें पढ़ाना आता ही नहीं था उन्होंने कभी किसी स्कूल में पढ़ाया नहीं था उनके पास सारी डिग्रियाँ असली थीं पर वे फर्जी तरीके से हासिल की गऍई थी संस्कृत के शिक्षक को संस्कधत नहीं आती थी अंग्रेजी के शिक्षक अंग्रेजी नहीं जानते थे गणित वाले शिक्षक को तो साधारण भाग का सवाल तक हल करना नहीं आता था।   
परीक्षा किसी ने नहीं दी थी पर रुपया भरपूर दिया था उनका पेपर किसी ओर न हल किया था और प्रथम श्रेणी की डिग्री उन्हें मिली थी सभी ने नौकरी जुगाड़ से हासिल की थी कोई विधायक चा रिश्तेदार था तो कोई सत्ताधारी पार्टी के जिलाध्यक्ष का भाई था कोई मंत्री का रिश्तेदार था किसी की मजाल नही थी जो उनसे कुछ कहने का साहस कर सके शिवशंकर जी भी उनके खिलाफ कोई कदम उठाकर उलझन में नहीं पडना चाहते थे इसका उन्होंने एक ही समाधान निकाला था कि अपने गाँव चे आठ शिक्षित नव युवकों को विद्यालय में पढ़ाने के लिए रख लिया था उनकी तनख्वाह वे अपनी जेब से देते थे उनको शासन द्वारा निर्धारित दर के अनुसार उन्हें वेतन दे रहे थे। पूरे स्कूल की शिक्षण व्यवस्था उन्होंने सम्हाल रखी थी एक बार की बात है स्कूल में कमिश्नर साहब का दौरा होने वाला था इसको मद्देनज़र रखते हुए उन्होंने सभी गुमशुदा शिक्षको की खोज कर ये बात बताई उस दिन सब बाहर के शिक्षकों को विद्यालय से दूर करना था सभी शिक्षक इस से सहमत थे लेकिन एक शिक्षक रामरतन ने आने में असम्र्थता बताई शपर शिवशंकर जी ने उससे जोर देकर कहा कि उस दिन तो स्कूल आना ही है।
दौरे एक दिन पहले एक नेता नुमा व्यक्ति उनके पास आया और बोला आपने रामरतन जी से बहुत बुरा बर्ताव किया है। सर विनम्रता उसे सारी बात समझाने का प्रयास कर रहे थे। पर वो कुछ सुनने को तैयार ही नही थे वो धमकी देने लगा आप मेरा कहा नहीं करूँगा तो मैं आपकी नौकरी खा जाऊँगा सुनकर सर मुस्कुरा दिए कुछ बोले नहीं वो नेतानुमा व्यक्ति पेट्रोल पंप का मैनेजर था वो यह नहीं जानता था कि जिनकी वो नौकरी खाने की धमकी दे रहा था वो कितने पावर फुल हैं दरउअसल उस पूट्रोल पंप के असली भालिक वही थे । जब पेट्रोल पंप पर गया उसके पहले उसके बर्ताव की खबर पंप के संचालक रोहित जी को हो गई। वो पेट्रोल पंप पर आया तो रोहित जी बोले तुम जिनकी नौकरी खाने की बात कर रहे थे वो इस पेट्रोल पंप के सही भालिक हैं यह कहकर रोहित जी ने उसे ही नौकरी से निकाल दिया यह सुनकर वो घबरा गया वो शिवशंकर जी के चरणों में माथा रगड़कर माफी माँगने लगा सर पिघल गए और उन्होंने
उनको फिर माफ । कर दिया । उन्हें फिर सै नौकरी पर रख लिया। रामरतन को निरीक्षण के समय उपस्थित होना पड़ा। कमिश्नर साहब को सच बात की भनक तक नहीं लगने दी दूसरे दिन स्कूल फिर शिवशंकर जी और उनके द्वारा नियुक्त किए गए , टीचर्स के हवाले हो गया था। कमिश्नर साहब खुश हो गए थे और अच्छी टिप्पणी लिख कर गए थे। 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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