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कहानी: ईमानदारी का मज़ा

मनोज तिवारी ने अपने पूरे कार्तकाल में ईमानदारी के साथ नौकरी की थी कमाऊ विभाग में होने के बाद भी उन्होंने कभी किसी से एक रुपये की भी रिश्वत नहीं ली थी इस कारण उनकी भ्रष्ट लोगों से दूरी बनी रहती थी आज वे सेवानिवृत हो गए थे। आज के दिन सबने उनकी खुलकर तारीफ की थी और यह भी कहा था आज जो वे स्वस्थ सुखी और संतुष्ट दिखाई दे रहें हैं वो उनकी ईमानदारी का प्रतिफल है ।उनकी बेटी प्रतिभा सरकारी अस्पताल में सर्जन थी और दामाद प्रकाश मेडिकल ऑफिसर उनका बेटा परिमल दबंग आइ ए एस अधिकारी थेमनोज जी भी भी बासठ वर्ष की उम्र में निरोगी और स्वस्थ थे । 
मनोज जी ने छत्तीस वर्ष पहले जब सरकारी नौकरी की शुरूआत की थी तब वे क्लर्क के पद पर थे। तभी से उन्होंने यह तय कर लिया था कि वे किसी से कभी भी रिश्वत नहीं लेंगे और अपने पूरे कार्यकाल में वे इस पर अडिग रहे थे उनके साथी उनकी खिल्ली उड़ाते उन्हें परले दर्जे का मूर्ख बताते पर वे कभी विचलित नहीं होते थे उनकी ईमानदारी की हर जगह चर्चा होती थी कुछ लोग उनका दिल से सम्मान करते थे नौकरी करते हुए उन्हें पूरे दो साल हो गए थे । एक बार वे ऑफिस आए तो देखा कि लेखापाल राकेश जी सिर पकड़ कर के बैठे हैं पूछने पर पता चला कि दिनेश शर्मा जी पाँच दिन बाद रिटायर होने वाले हैं उनका पेंशन प्रकरण बनना है । राकेश जी जिसकी सहायता से ये प्रकरण तैयार करते थे वो छुट्टी पर थे और उन्हें कुछ सूझ नहीं पड़ रही थी राकेश जी शर्मा जी से पंद्रह हजार रुपये रिश्वत के भी ले चुके थे। उन्हें कुछ सूझ नहीं पड़ रही थी कि वे क्या करें तब मनोज जी ने कहा इसमें मैं आपकी पूरी मदद कर सकता हूँ पर राकेश को उनकी बात पर भरोसा नहीं हुआ पर मनोज जी बोले एक बार मौका देकर तो देखिए राकेश जी के पास और कुछ चारा भी नहीं था मात्र तीन दिन में उन्होंने पूरे प्रकरण का निपटारा कर दिया था राकेश उनकी दक्षता के कायल हो गए थे वे हिम्मत जुटाकर बोले मनोज जी आपने तो कमाल कर दिया मेरी सारी समस्या हल कर दी हमने पन्द्ह हजार की रिश्वत इस कार्य के लिए ली थी जिसमें सभी का हिस्सा है जो पेंशन प्रकरण तैयार करता है उसे पाँच हजार रुपये दिए जाते हैं पर मैं खुश होकर आपको सात हजार रुपये देना चाहता हूँ उस जमाने मे सात हजार रुपये बहुत होते थे साढ़े तीन हजार रुपये महीना तो मनोज की तनख्वाह ही थी और उन्हें तीन दिन के काम के बदले सात हजार रुपये मिल रहे थे । यह बहुत बडी रकम थी जिसे लेने से उन्होंने साफ इंकार तो किया ही साथ ही ये भी कहा कि ये रुपये वे शर्मा जी को वापस कर दें। राकेश ने कुछ नहीं कहा वो पैसे लेकर वापस आ गया वो पूरे पैसे राकेश ने हजम कर लिए थे यह बात मनोज जी ने अपनी पत्नी विमला से कही तो विमला बोली आपने बिल्कुल ठीक किया वो भी मनोज जी की ईमानदारी पर गर्व करती थी शादी के बाद वो भी सरकारी स्कूल में टीचर बन गई थी दोनों के वेतन में उनका खर्च आराम से चल रहा था जबकि बाकी के उनके सहकर्मी रिश्वत लेने के बाद भी खर्चे का रोना रोते रहते थे उनकी पूर नहीं पड़ती थी। देखा जाए तो मनोज जी ईमानदार होने के कारण मज़े से रह रहे थे जबकि उनके साथी परेशान थे। मनोज जी आज जब रिटायर हुए तो उनके चेहरे पर खुशी थी ईमानदारी से नौकरी करने के बाद भी वे एक सफल इंसान थे यही उनकी ख़ुशी का कारण था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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