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कहानी: बेईमानी की सज़ा

वकील सोमनाथ जी की पत्नी नमिता की बीमारी में पूरे  पाँच लाख रुपये खर्च होने के बाद भी आराम नहीं मिला था इसके बाद एक नामी आयुर्वेद चिकित्सक की पूरे छः  महीने तक दी गई दवाओं के सेवन से वो ठीक हुई थी उसमें उनके पूरे चार लाख रुपये लग चुके थे कहने वाले तो यहाँ तक कह रहे थे कि यह उस बेईमानी की सज़ा है जो उन्होंने अपने ड्राइवर रतनलाल के साथ की थी।
रतनलाल दो साल पहले उनकी कार का ड्राइवर था वे उसे पन्द्रह हज़ार रुपये महीना वेतन देते थे। रतनलाल ईमानदार और नेक इंसान था अपना काम अच्छे से करता था। सोमनाथ जी की पत्नी नमिता उसे अक्सर परेशान करती थी बिना किसी गलती के ही उसे डाँटती फटकारती रहती थी। सोमनाथ जी का व्यवहार थोड़ा ठीक था पर वे अपनी पत्नी से कुछ कह नहीं पाते थे। रतनलाल गाँव से  रोज सुबह आठ बजे आ जाता था और रात के आठ बजे तक रुकता था। उसका गाँव शहर से पाँच किलोमीटर दूर था। एक दिन उसने सोमनाथ जी से कहा कि एक साल बाद मेरी लड़की पुष्पा की शादी है मुझे उसमें दो लाख रुपये की जरूरत पड़ेगी आप ऐसा करें मेरी हर महीने का वेतन आप जमा करते जाएँ जब बेटी की शादी आ जाए तब आप मेरे पैसे मुझे लौटा दें, सोमनाथ जी ने कहा ठीक है। यह बात शहर के ज्वेलर सोहनलाल भी सुन रहे थे वे बोले आप मुझे अगर इसके वतन के पन्द्रह हजार रुपये महीना दें तो मैं उसपर डेढ़ प्रतिशत प्रतिमाह से चक्रवृद्धि ब्याज दूँगा इसे लगभग तीन लाख रुपये मिल जाएँगे उसकी मदद हो जाएगी और मुझे आधे प्रतिशत ब्याज का लाभ होगा। सोमनाथ जी को भी यह बात जम गई पर उन्होंने इस संबंध में रतनलाल से कुछ नहीं कहा, वे उसे सरप्राइज देना चाहते थे। रतनलाल साल भर तक बिना वेतन के उनके यहाँ काम करता रहा इस आस में कि उसकी बेटी की शादी वो अच्छे से कर सकेगा उसके पास एक एकड़ जमीन थी जिससे उसकी पत्नी सब्जी फूल फल प्राप्त कर घर का खर्च जैसे तैसे चला रही थी। वो मजदूरी भी करने जाती थी। रतनलाल के पास मात्र दो जोड़ी कपड़े थे वो बड़ी सादगी से रहता था। सोमनाथ जी हर महीने पन्द्रह हजार रुपये सोहनलाल सेठ जी को जमा करा देते थे। यह बात नमिता को भी मालूम थी बल्कि नमिता ही सोहनलाल के यहाँ पैसे जमा करने जाती थी। सोहनलाल जी उसका हिसाब ठीक से रख रहे थे। धीरे धीरे पूरा साल गुजर गया था, एक दिन नमिता जब सोहनलाल जी की दुकान पर पहुँची तो उसे एक सोने का हार पसंद आ गया। जिसकी कीमत बारह लाख रुपये थी। नमिता के पास नौ लाख रुपये तो थे पर तीन लाख रुपये कम पड़ रहे थे सोमनाथ जी को वो इसकी खबर भी नहीं लगने देना चाहती थी। उसने सेठ सोहनलाल जी से कहा कि रतनलाल के कितने रुपये जमा हो गए आपके पास पूरे ब्याज सहित जोड़कर बताना। वो बोले कुछ पैसे मैंने तीन फीसदी ब्याज पर भी दिए हैं जिसकी वजह से रतनलाल के तीन लाख अठ्ठाइस हजार दो सौ पचास रुपये अब तक जमा हो चुके हैं। नमिता ने सेठ सोहनलाल को उन पैसों को हार की बाकी कीमत के रूप में अदा कर दिया तथा कहा कि अगले महीने मेरी एफ डी मेच्योर हो रही है वो पैसे मैं रतनलाल को दे दूँगी। सेठजी को इसमें कोई ऐतराज कैसे होता क्योंकि उसी ने रुपये जमा किए थे। इस तरह नमिता को मनचाहा हार मिल गया जिसे पाकर वो बड़ी खुश हो रही थी। रतनलाल की बेटी की शादी अगले माह होना तय हो गई थी। वो अपने रुपये लेने के लिए सोमनाथ जी के पास पहुँचा सोमनाथ जी ने नमिता से कहा इसके पैसे दे दो जितने जमा हुए हैं नमिता के मन में खोट आ गई थी, उसने झूठ बोलते हुए कहा कि मैंने परसों ही तो इसे पूरे तीन लाख अठ्ठाइस हजार दो सौ पचास रुपये दिए थे यह झूठ बोल रहा है। इसके मन में लोभ आ गया है रतनलाल की यह बात सुनकर हालत खराब हो गई थी। उसकी आँखों में बेबसी के आँसू आ गए थे। वो अपने इकलौते बेटे की कसम खाकर बोला कि आपने मुझे पैसे नहीं दिए इस पर वो उसे फटकारते हुए बोली मैं भी अपने बेटे की कसम खाकर कह रही हूँ कि मैंने परसों तुझे पूरे पैसे दे दिए। बेटे की कसम उसने सोमनाथ को विश्वास दिलाने के लिए खाई थी। जिसमें वो सफल रही थी सोमनाथ जी को यह लगने लगा था कि रतनलाल झूठ बोल रहा है। रतनलाल पूरी तरह टूट चुका था हताश होकर बोला ठीक है साहब आप बड़े लोग हैं, ऊपर वाला सब देख रहा है। मेरे पैसे आपके लिए कोई बड़ी रकम नहीं हैं पर मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी रकम है। अब मैं अपनी बेटी की शादी कैसे करूँगा। इसके साथ ही उसने सोमनाथ जी से कहा साहब मैं कल से नौकरी पर नहीं आ सकूँगा। मेरी एक महीने का वेतन दे दीजिए इस पर नमिता बोली तू अपनी इच्छा से नौकरी छोड़कर जा रहा है इसलिए तुझे एक रुपया भी नहीं मिलेगा। सोमनाथ इस पर कुछ नहीं बोले रतनलाल दुखी मन से वहाँ से चला गया। घर आकर उसने अपनी पत्नी को सारी बात बताई उसकी पत्नी विमला बहुत समझदार और धैर्यवान महिला थी। उसने अपने पिता से कर्ज लिया  कुछ जेवर बेचे कुछ अपनी बचत में से रुपये निकाले कुछ रकम उधार ली, समधी बहुत अच्छे थे शादी थोड़ी हल्की हुई पर उन्होंने इस पर समधी रतनलाल जी से कुछ नहीं कहा। रतनलाल अब स्कूल वेन चलाने लगा था। इधर सोमनाथ जी ने कार के लिए नया ड्राइवर रखा था उसका नाम चंपालाल था वो रतनलाल जैसा भला इंसान नहीं था। अब सोमनाथ जी को रतनलाल की कमी खल रही थी। पर क्या कर सकते थे एक दिन की बात है नमिता कार में बैठी थी चंपालाल कार चला रहा था नमिता ने किसी बात पर उसे तगड़ी फटकार लगाई थी जिससे चंपालाल उससे चिढ़ा हुआ था। इसकी कसर उसने ऐसे निकाली जब नमिता थोड़ी लापरवाही से बैठी थी तब उसने गाड़ी को झटका देकर इतनी तेजी से ब्रेक लगाए कि वो तेजी से आगे को गिरी उसे सम्हलने का मौका ही नहीं मिला उसका सिर टकराया जिसमें खून निकला, हाथ में फ्रेक्चर हो गया तथा पैर में आठ टाँके आए। शाम को जब सोमनाथ घर आए तो नमिता बिस्तर पर थी। उसकी यह हालत देखकर वो घबरा गए बोले मुझे खबर क्यों नहीं की नमिता बोली मैंने ही मना कर दिया था। चंपालाल निहायत घटिया इंसान था उसने सहानुभूति का दिखावा कर नमिता का इलाज करवाया था पैसे तो सोमनाथ के ही लगे थे पर उसने दौड़भाग की थी। नमिता तीन महीने तक बिस्तर से नहीं उठ सकी थी। तीन महीने बाद जब ठीक हुई तो उसे तेज बुखार आ गया जिससे उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वहाँ से जब उसे कुछ आराम मिला तो वो घर आ गई मगर फिर उसे बुखार आ गया ऐसा करते करते पूरे छः महीने हो गए थे पर नमिता को आराम नहीं लगा था। डॉक्टर हार गए थे सोमनाथ जी के पूरे पाँच लाख इलाज में खर्च हो गए थे पर नमिता को आराम नहीं लग रहा था। तब किसी ने नाड़ी वैद्य शिवकाँत चतुर्वेदी जी के बारे में बताया। सोमनाथ जी नमिता को लेकर शिवकांत जी के पास आए। शिवकाँत जी ने नाड़ी देखकर बीमारी का पता तो लगा लिया पर उसकी सही दवा उनके पास नहीं थी जो दवा थी वो बीमारी को जड़ से खत्म नहीं कर सकती थी फिर भी उन्होंने नमिता को दवा दी तथा पूरी तरह ठीक करने का आश्वासन भी दिया जब सोमनाथ जी नमिता को दिखाकर जा रहे थे तभी रतनलाल का वहाँ आना हुआ वो अर्जुन छाल लेकर वैद्य जी के पास आया था वो ये छाल वैद्य जी को बेचता था। उसके गाँव में नदी के किनारे बहुत अर्जुन के पेड़ थे जहाँ से वो ये छाल प्राप्त करता था। उसने वैद्य जी से नमिता के विषय में पूछा तब वैद्य जी ने सारी बात बताई रतनलाल ने भी वैद्य जी को अपने साथ हुई धोखाधड़ी के बारे में बताया जिसे सुनकर वैद्य जी को भी दुख हुआ। रतनलाल बोला मेरे रोशनलाल भी जीर्ण ज्वर की दवा देते थे दूर दूर से उनके पास लोग आते थे और वे किसी से एक रुपया भी नहीं लेते थे अब वो तो इस दुनिया में नहीं रहे पर उनकी बनाई दवा है मेरे पास वैद्य जी बोले तू मुझे वो दवा लाकर दे अगर वो दवा ठीक निकली तो मैं तुझे उसके पूरे चार लाख रुपये दूँगा। रतनलाल ने कहा भी की वो उसके पैसे नहीं लेगा लेकिन वैद्य जी ने उसकी बात नहीं मानी। दवा अचूक थी वैद्य जी ने पूरे चार लाख रुपये रतनलाल को दे दिए उसी दवा से वैद्य जी ने नमिता का इलाज किया जिससे नमिता पूरी तरह ठीक हो गई। इलाज पूरे छः महीने तक चला था जिसके वैद्य जी ने पूरे चार लाख रुपये लिए थे। वैद्य जी को इस बात का संतोष था कि उन्होंने इस बहाने से एक नेक इंसान को उसका पैसा वापस दिलवा दिया था। वे सोच रहे थे कि अगर रतनलाल अब भी सोमनाथ जी के यहाँ काम कर रहा होता तो इस दवा का एक भी रुपया सोमनाथ जी से नहीं लेता और इसके बदले में सोमनाथ जी उसे धन्यवाद तक नहीं देते। वही सोमनाथ जी जो वैद्य जी से यह कह कर गए थे कि आपने नमिता की लाइलाज बीमारी ठीक की आपका अहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगा।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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