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कहानी: शौक बना कमाई का जरिया

आज राजेश  शहर के अच्छे केटरर माने जाते हैं उन्हें हर समय काम मिलता रहता है उनकी खुद की भी शहर में एक होटल है जो अच्छी खासी चलती है।  कभी अत्यंत गरीब रहे राजेश की गिनती आज शहर के संपन्न लोगों में हो रही थी।
राजेश का बचपन गरीबी में बीता उनके पिताजी बाबूलाल  किराने की दुकान पर काम करते थे। उसी से उनके परिवार का गुजारा चलता था बड़ा  बाजार के रहवासी क्षेत्र में वे किराये के मकान में रहते थे। राजेश आठवीं से आगे नहीं पढ़ पाए थे ।।  उनके सभी दोस्त  व्यापारियों के  बेटे थे उनमें सबसे गरीब  राजेश ही थे। राजेश बहुत बातूनी थे कई कविताएँ उन्हें याद थीं चुटकुलों का तो उनके पास ख़जाना था।  व्यापारियों के बेटे जब शहर से बाहर पार्टी  करते थे तो उसमें राजेश भी शामिल होते थे।  राजेश के पास पैसे तो होते नहीं थे इसलिए वे सेवा करते थे  धीरे धीरे वे खाना बनाना भी सीख गए थे । पार्टी में वे भोजन तैयार कर ने लगे थे  उनके हाथों में स्वाद  था। उनके द्वारा बनाए  दाल बाफले लड्डू  बड़े स्वादिष्ट  होते थे, । यही काम अब उनकी आमदनी का जरिया बन गया था।  उन्होंने अपनी होटल भी खोल  ली थी  अब वे
केटरिंग  का काम भी कर रहे थे बड़े बड़े  आयोजनों  में  भोजन   तैयार करने लगे थे शहर से बाहर भी उन्हें बुल्या जाता था। इस कमाई से राजेश  जी ने अपना खुद का पक्का मकान बना लिया था। जिसमें  वे अपने परिवार सहित  सुखपूर्वक रह रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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