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कहानी: काली गाय

हाईवे के किनारे  स्थित गाँव शेरपुर के सुखलाल के पास एक काली गाय थी  जिसकी मौत सुखलाल की ही वजह से हुई थी ऐसा लोगों का कहना था उस काली गाय की मौत के साथ ही एक होनहार इंजीनियर प्रकाश का भी दुखद निधन हुआ था जिसका कारण भीषण सड़क हादसा था। सुखलाल उस समय तो बच गया था लेकिन कुदरत ने उसे माफ नहीं किया था उस हादसे के एक महीने बाद उसे कैंसर हो गया था और उस बीमारी से वो साल भर तड़पा था उसकी हालत देखकर सबको तरस आता था सब कहते थे भगवान इसे मौत दे दे ताकि इसको कष्ट से मुक्ति मिल सके। 
साल भर पहले शेरपुर गाँव में थाना प्रभारी विवेक और एस डी एम विकास आए थे और ग्रामीणों को सख्त हिदायत देकर गए थे कि वे अपने पालतू पशुओं को हाईवे पर खुला न छोड़ें उनके कारण सड़क दुर्घटनाएँ हो रही हैं  अगर फिर भी कोई ऐसा करेगा तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी सभी गाँव के लोगों ने यह बात मान ली थी और हाईवे पर अपने जानवर नहीं ले जाते थे उन्हीं गाँव वालों में से सुखलाल ऐसा व्यक्ति था जिस पर एस डी एम साहब और थाना प्रभारी की हिदायत का कोई असर नहीं पड़ा था सुखलाल के पास एक काली गाय थी  बिल्कुल काली सुखलाल जब तक उस गाय को घर में रखता जब तक वो दूध देती रहती थी जब वो दूध देना बंद कर देती तो उसे खुला छोड़ देता था वो ऐसे ही घूमती रहती थी सुखलाल देखता कि अब गाय जनने वाली है और दूधारू होने वाली है तब उसे घर में रख लेता था इस बार भी उसने ऐसा ही किया काली गाय ने दूध देना बंद कर दिया था तो सुखलाल ने भी उसे छुट्टा छोड़ दिया था वो गाय अब न दिन में आती न रात में। खुली घूमती रहती थी। वो गाय हाईवे की सड़क पर बैठ जाती थी  वाहन चालकों को इससे बड़ी दिक्कत होती थी पर सुखलाल को इससे कोई मतलब नहीं था जो गाय दूध नहीं दे रही वो उसे घर में क्यों रखे ऐसी उसकी सोच थी दुर्घटना वाली रात को सुखलाल की वही गाय हाईवे पर बैठी हुई थी काली अंधेरी रात थी प्रकाश जो साफ्टवेयर इंजीनियर थे अभी उनकी उम्र उन्तीस वर्ष थी उनकी  शादी हुए साल भर भी नहीं हुआ था उनकी पत्नी छाया गर्भवती थी। वे शहर में अकेले रूम किराये से लेकर रह रहे थे हाल ही में एक डुप्लेक्स का सौदा भी उन्होंने किया था जिसमें पत्नी की डिलेवरी के बाद वे रहने वाले थे।  रात को साढ़े ग्यारह बजे वे तेजी से मोटर सायकिल चलाते अपने दोस्त मनीष से मिलकर अपने रूम की तरफ जा रहे थे अंधेरी रात थी उस रात में सड़क पर बैठी काली गाय को वे देख नहीं पाए उनकी बाईक बहुत तेज स्पीड में थी उनकी उस गाय से भीषण टक्कर हो गई  टक्कर इतनी भयानक थी कि जिसमें गाय का सींग विवेक के पेट में घुस गया था गाय भी बुरी तरह घायल हुई थी उसका वो सींग टूटकर ही अलग हो गया था प्रकाश  एक घंटे तक सड़क पर पड़ा रहा किसी ने गाड़ी रोक कर उसे अस्पताल तक नहीं पहुँचाया वो तो वहाँ से उसका परिचित परेश कार से जा रहा था उसकी नजर  दुर्घटनाग्रस्त प्रकाश पर पड़ी वो उसे पहचान गया उस समय तक प्रकाश जीवित था परेश उसे अस्पताल ले गया डॉक्टर उसका इलाज कर ही रहे थे कि उसने दम तोड़ दिया। काली गाय की मौत भी हो गई थी दूसरे दिन शेरपुर गाँव में पुलिस आई थी पुलिस ने सबसे पूछताछ की पर किसी ने ये नहीं बताया कि ये गाय सुखलाल की थी  पुलिस ने यही समझा कि गाय लावारिस है। हादसे का जिम्मेदार सुखलाल साफ बच गया था पर नियति को कुछ और ही मंजूर था कुदरत शायद उसे बड़ा दंड देना चाहती थी। दो माह पहले सुखलाल के पाँव में खेत पर घूमते समय मक्का का ठूँठ घुस गया था थोड़ा बहुत खून भी निकला। सुखलाल ने जख्म पर ध्यान ही नहीं दिया दो महीने बाद जब घाव पर अत्यंत दर्द होने लगा तथा आसपास की खाल नीली पड़ गई तब उसे लोग सरकारी असपताल में ले आए। जाँच के बाद पता चला कि उसे कैंसर हो गया है। और तीसरी स्टेज पार कर चौथी में पहुँच रहा है डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था कहा था कि अब कुछ नहीं हो सकता। सुखलाल घबरा गया था इसके साथ ही उसकी यातना की शुरूआत भी हो गई थी उसका जख़्म सड़ने लगा था डाक्टरों ने उसका पैर काट दिया था लेकिन जहर फिर भी फैल गया था। सुखलाल के पास पैसे भी नहीं थे। लोगों ने उसे बुरी तरह से तड़पते देखा था। सुखलाल कोई भला आदमी तो था नहीं। उसने जीवन में कई बुरे कर्म किए थे उसका नतीजा ही अब सामने आ रहा था। सुखलाल की मौत ने सबको हिलाकर रख दिया था।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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