चैनपुरा गाँव के हरिलाल पटेल भूमि विवाद के मामले श्यामनगर के तहसील कार्यालय में पेशी करने आए थे अंदर कोर्ट में तहसीलदार साहब दीवानी मामलों की सुनवाई कर रहे थे हरिलाल अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे दरवाजे के बगल में नाम पट्टिका लगी हुई थी जिसमें लिखा हुआ था सी एल मालवीय तहसीलदार एवं व्यवहार न्यायाधीश वे अभी थोड़े दिन पहले ही यहाँ आए थे इसलिए हरिलाल पटेल उन्हें जानते नहीं थे। जब उनका नाम पुकारा गया तो वे अंदर दाखिल हुए जैसे ही उनकी निगाह तहसीलदार के चेहरे पर पड़ी तो वे चौंक गए मन ही मन बोले अरे ये तो अपना छग्गू है यह यहाँ कैसे ये तो हमारे ग्राम के दलित वर्ग का अनपढ़ था यह तहसीलदार कैसे बन सकता है सी एल मालवीय जिनका पूरा नाम छगनलाल मालवीय था वे भी हरिलाल पटेल को पहचान गए थे लेकिन पीठ पर होने के कारण उन्होंने ऐसी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की सारी कार्यवाही निष्पक्षता के साथ की। पेशी करने के बाद वे घर आ गए थे तथा छग्गू का बड़ा भाई जग्गू को बुलाकर छग्गू के बारे में पूरी जानकारी लेने के बाद हैरत में पड़े हुए थे।
यह सब घटनाएँ जो आज घटित हुई थीं वे उन्हें विचलित कर रही थीं।
उन्हें वो समय याद आ रहा था जब छगन के पिता फगुना उनके खेतों में मजदूरी करते थे एक दिन घास काटते समय फगुना को साँप ने डँस लिया था। तथा उनकी दुखद मौत हो गई थी फगुना के ऊपर हरिलाल पटेल का बहुत कर्ज था। फगुना की पत्नी सुक्खी से हरिलाल पटेल ने कहा ये कर्ज कौन अदा करेगा सुक्खी बोली हम आपके खेतों में मजदूरी कर के अदा कर देंगे छगन का बड़ा भाई जग्गू अठारह वर्ष का था और वह श्याम लाल के खेतों में काम करता था उसके ऊपर श्यामलाल का कर्ज चढ़ा हुआ था तभी उनकी नजर छगन पर पड़ी छगन अभी बारह वर्ष का बालक था गरीबी के कारण स्कूल नहीं गया था। हरिलाल ने कहा कर्ज के बदले ये छग्गू मेरे यहाँ काम करेगा सुक्खी कुछ कह न सकी और वे बारह वर्ष के छग्गू को बँधुआ मजदूर बनाकर ले आए। छग्गू को उन्होंने घर के काम के लिए रख लिया था उसे कर्ज के बदले चार साल तक हरिलाल का नौकर बनकर रहना था। हरिलाल पटेल का लड़का था जगदीप उसकी उम्र छः वर्ष की थी जगदीप की छगन से अच्छी दोस्ती हो गई थी वो उसे छोटे मालिक कहता था हरिलाल जी ने जगदीप का कक्षा एक में एडमीशन कराया था। वो छगन के साथ स्कूल जाता और छगन के साथ ही वापस आता था जिस दिन छगन को हरिलाल दूसरा काम सौंप देते उस दिन जगदीप स्कूल ही नहीं जाता था हारकर हरिलाल ने छगन की डयूटी जगदीप के साथ स्कूल आने जाने में लगा दी थी जब जगदीप पढ़ता तब छगन स्कूल के बरामदे में बैठा रहता बच्चों को पढ़ता देख उसके मन में भी पढ़ने की इच्छा हुई उसने यह पाया कि उसका दिमाग इन बच्चों से ज्यादा तेज है वह टीचर को पढ़ाते हुए देखता सुनता समझता और उन्हें याद कर लेता इन चार सालों में जगदीप ठीक से पढ़ना लिखना नहीं सीख पाया था जबकि छगन सब कुछ सीख गया था पाँचवी तक का हिन्दी गणित विज्ञान पर्यावरण का एक एक अध्याय उसे याद हो गया था गणित के सारे सवाल वो हल कर सकता था। एक दिन पाँचवी की हिन्दी की किताब को बिना अटके पढ़ते हुए उन्हें शिक्षक कमल सर ने देख लिया तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कमल सर ने जब उसकी परीक्षा ली तो चकित हो गए थे इधर हरिलाल के यहाँ काम करते हुए छगन को चार साल हो गए थे हरिलाल छगन को छग्गू ही कहते थे। हरिलाल ने छगन को आजाद कर दिया था कमल सर छगन की माँ सुक्खी की सहमति से छगन को अपने साथ ले गए थे उसका उन्होंने पाँचवी की परीक्षा का प्राइवेट फार्म भरवा दिया था सुबह शाम छगनलाल को अखबार बाँटने का काम दिलवा दिया था छगन ने पाँचवी की परीक्षा में टॉप किया था। कमल सर ने तीन साल बाद उसे आठवीं की परीक्षा में बैठाया उसमें भी छगन ने टॉप किया था अब छगन एक बुक स्टोर पर काम करने लगा था समय मिलने पर वो अपनी पढ़ाई कर लेता था उस स्टोर पर काम करते छगन ने दसवीं बारहवीं तथा बीए की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में पास कर ली थीं सारी पाठ्यसामग्री छगन को दुकान से ही मिल जाती थी छब्बीस साल की आयु में छगन ने बी ए पास किया था और इसके ठीक एक साल बाद उसका पी एस सी में तहसीलदार के पद पर चयन हो गया था अठ्ठाइस साल में छगन की शादी सरिता से हुई थी सरिता लोक अभियोजक थीं। इस समय छगनलाल की उम्र बत्तीस वर्ष की थी अब उन्हें छग्गू या छगन कहने वाला कोई नहीं था अब सब उन्हें सी एल मालवीय साहब के नाम से जानते थे। हरिलाल ने जबसे जग्गू से छगन जी के विषय में जानकारी मालूम की थी तभी से वे सोच में डूबे हुए थे। उनका लड़का जगदीप तीन साल में भी दसवीं पास नहीं कर पाया था दूसरी तरफ छगन थे जो तहसीलदार के पद पर बैठे हुए थे। हरिलाल पटेल को जल्दी ही ये बात समझ आ गई कि अब वो पुराने छग्गू नहीं हैं अब वो वरिष्ठ अधिकारी हैं अगर उनसे तालमेल नहीं बैठाया तो उनका बड़ा नुक्सान हो सकता है यही सोचकर अब उन्होंने शिष्टाचार का पालन करते हुए सी एल मालवीय जी से निकटता बढ़ाने का विचार कर लिया था तभी उन्हें रात को नींद आ सकी थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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