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कहानी: राजू उस्ताद जी

वे दुर्गा नगर में राजू उस्ताद जी के नाम से मशहूर थे तथा हाईवे पर स्थित होदल में कुकिंग का काम करते थे वैसे तो वे सभी प्रकार की मिठाइयाँ और नमकीन बना लेते थे पर होटल मालिक अशोक उनसे समोसा बनवाते थे उस होटल के समोसे काफी मशहूर थे राजू उस्ताद को सुब्ह आठ बजे से रात के आठ बजे तक बिल्कुल फुर्सत नहीं मिलती थी अशोक उन्हें दोगुनी तनख्वाह देते थे आज जब राजू उस्ताद जी ने अशोक जी से दो दिन की छुट्टी माँगी तो वे अनमने हो गए बोले बहुत जरूरी काम है क्या ? राजू जी ने कहा साले की बेटी की शादी है जाना बहुत जरूरी है । अशोक जी को छुट्टी देनी पड़ी पर वे समझ गए की आने वाले इन दो दिनों में उनकी होटल से समोसों की बिक्री बहुत कम होगी।
राजू उस्ताद जी सात साल से अशोक जी की होटल पर हलवाई का काम कर रहे थे। तभी से उनकी होटल के समोसे हर तरफ मशहूर हो गए थे। अशोक जी ने बहुत प्रयास किए की कोई और हलवाई उनसे समोसे बनाने में निपुण हो जाए पर उन्हें सफलता नहीं मिली चार साल पहले ऐसी नौबत भी आई थी जब जरा सी कहासुनी पर राजू उस्ताद जी ने काम छोड़ दिया था । और अपनी जमा पूँजी से शहर के भीतर होटल खोल ली थी होटल तो अच्छी चली लेकिन उनके ही बहनोई ने उनके साथ बेईमानी कर ली राजू उस्ताद कोई पढ़े लिखे तो थे नहीं दस वर्ष की उम्र में गाँव छोड़कर दुर्गा नगर में आ गए थे तभी से वे होटल में काम कर रहे थे वो बहुत अच्छे हलवाई तो थे पर हिसाब किताब व पढ़ाई लिखाई में कमजोर इसलिए उन्होंने अपने बहनोई रामसखा को काउण्टर पर बैठाया था वे तो होटल मालिक होकर भी हलवाई का काम कर रहे थे। राजू उस्ताद जी के पूरे दो लाख रुपये खर्च हो गए थे लेकिन आवक एक रुपये की भी नही हुई थी जीजा जी रामसखा यही कहते रहे कि महीने के आखिर में हिसाब लगाएँगे तब पता चलेगा कि कितना लाभ हुआ है लेकिन जब हिसाब हुआ तो राम सखा ने पचास हजार का नुक्सान निकाल दिया जो थोक दुकानदार के कर्ज के रूप में था और इसके साथ ही रामसखा नौकरी छोड़कर चला गया बाद में राजू उस्ताद को पता चला कि रामसखा उनको सात लाख रुपये का चूना लगाकर गया है पर वे विवश थे कुछ कर नहीं सकते थे इतना जरूर हुआ था कि अब उनके संबंधों में खटास आ गई थी राजू उस्ताद जी को अपनी होटल बंद करना पड़ी थी फिर कुछ दिनों तक राजू उस्ताद जी ने शादी समारोहों में भोजन बनाने का काम भी किया। एक दिन होटल मालिक अशोक जी खुद राजू उस्ताद जी के घर आए हाथ जोडकर माफी माँगी और वापस अपना काम सम्हालने का उनसे अनुरोध किया जिसे राजू उस्ताद जी टाल नहीं सके थे तभी से वे अशोक जी की होटल पर काम कर रहे थे अशोक जी उनका बहुत सम्मान करते थे होटल के सभी कर्मचारी राजू उस्ताद जी को पूरा सम्मान देते थे तथा उनकी कुशलता के कायल थे। अशोक जी उनको छुट्टी देने के बाद सोच रहे थे छुट्टी देना भी बहुत जरूरी था क्योंकि राजू उस्ताद जी ने आज तक कभी अकारण या बहाना बनाकर छुट्टी नहीं ली थी पर इन दो दिनों में जो उनकी बिक्री प्रभावित होने वाली थी इसकी उन्हें बडी चिंता थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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