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कहानी: राखी

प्रमिला इस बार राखी पर अपने मायके नहीं गई थी वैसे भी उसके दोनों भाई राखी बँधवाते नहीं थे जबकि बड़ी बहन , शर्मिला की खूब चापलूसी भी करते थे और राखी भी बँधवाते थे माँ बाप के जीवित रहते प्रमिला हर वर्ष राखी पर मायके जाती थी भाई फिर भी राखी नहीं बँधवाते थे माँ ही अपनी तरफ से उसे कुछ रुपये और साड़ी देकर उसको थोड़ा संतोष प्रदान कर देती थी।
पर्मिला के पिता दीनानाथ दो वर्ष पहले गुजर गए उनके निधन के तीन महीने बाद माँ का भी देहान्त हो गया था। माँ बाप के निधन के बाद पहली राखी पर प्रमिला मायके गई थी तब भी दोनों भाईयों ने उससे राखी नहीं बँधवाई थी सीधे मुँह बात तक नहीं की थी उससे ।
और बड़ी बहन की खूब सेवा खुशामद कर रहे थे उसकी दोनों भाभियाँ भी बड़ी ननद का ही ख्याल रख रही थीं प्रमिला सोच रही थी अच्छा हुआ कि वो अपने पति परेश को अपने साथ नहीं लाई वरना उनके साथ भी ये दोनों भाई बुरा बर्ताव करते जीजाजी का खूब आदर सत्कार होता और परेश जी से तो घर के कुत्ते से भी बुरा बर्ताव करते । वो तो इस घर की बेटी है फिर भी अपनी उपेक्षा को सहन नहीं कर पा रही थी वे तो इस घर के दामाद हैं वो ऐसा व्यवहार कैसे सहन कर पाते उसे माँ बाप की बहुत याद आ रही थी एक तो अपमानजनक व्यवहार ऊपर से माँ बाप की कमी ने उसे झिझोड़ कर रख दिया था वो रोती तो उसके आँसू पौंछने वाला तक कोई नहीं था दोनों भाईयों ने मिल बाँटकर माँ बाप की पूरी जमीन जायदाद संपत्ति रकम जेवरात नगदी सब हड़प ली थी बड़ी बहन ने दोनों भाइयों का पूरा साथ दिया था इसके बदले में उसे भी बहुत कुछ मिला था लेकिन प्रमिला को तो सिवाय अपमान तथा उपेक्षा के कुछ भी नहीं मिला था बड़ी बहन सबकी लाड़ली थी उसने इसका फायदा उठाया और प्रमिला के व्यक्तित्व को उभरने ही नहीं दिया था। ऐसा कई बार हुआ था डब शादी के बाद प्रमिला और उसकी दीदी एक साथ मायके में होतीं थीं तब प्रमिला को बिल्कुल भी महत्व नहीं मिलता था बड़ी दीदी सबके दिलो दिमाग पर छाई रहती थी घर में बड़ी दीदी के पसंद का ही खाना बनता था प्रमिला की पसंद नापसंद की कोई परवाह भी नहीं करता था यही हाल प्रमिला के पति का भी होता था जीजाजी के सामने उसकी कोई हैसियत नहीं रहती थी प्रमिला सब कुछ सहन करती रही वो अच्खी राखी लाई थी मिठाई में काजू कतली लाई थी पर भाईयों को तो दीदी की सोनपपड़ी और साधारण अच्छी लग रही थी राखी के बाद जब वो जाने लगी तो बड़ी भाभी बोली तुम्हारे लिए हम साड़ी खरीद कर नहीं ला पाए जब अगली बार आओगी तब अपनी साड़ी ले जाना दीदी की विदाई में मँहगी साड़ी और दो हजार रुपये नगद दिए गए थे प्रमिला को चलते समय छोटी भाभी ने बीस रुपये दिए थे । कौन देता है इतने कम रुपये वो मना करने लगी तो बोली रख लो शगुन के पैसे हैं मना नहीं करते जब वो जा रही थी तब किन्नर आ गए थे वे राखी का इनाम माँग रहे थे तो प्रमिला ने वे बीस रुपये उन्हें दिए थे वे भड़क गए बोले हमें क्या भिखारी समझ रखा है तब प्रमिला ने अपनी तरफ से तीस रुपये और मिला कर उन्हें पचास रुपये दिए थे तब कहीं वे माने थे पर किसी भाभी या भैया ने उन तीस रुपयों की भरपाई नहीं की थी । प्रमिला खुशी खुशी आई थी और दुखी मन लेकर जा रही थी। इसके बाद ये दूसरी राखी आई थी जिस पर प्रमिला ने मायके न जाने का निर्णय लिया था माँ बाप कै बाद अब मायके में कोई उसका नहीं था जाकर करती भी क्या गत वर्ष का अपमानजनक व्यवहार वो भूली नहीं थी। फिर किसी भाई भाभी ने फोन कर उसे राखी पर आने के लिए कहा भी तो नहीं था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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