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कहानी: खोटा सिक्का

जिस कुसुम ने अपनी बेटी रजनी को खोटा सिक्का समझकर फैंक दिया था आज वही रजनी उसके बुढ़ापे का सहाना बनी हुई थी रजनी के पास रहते हुए उसे पूरे पाँच वर्ष हो गए थे इन पाँच वर्षों अः बहू बेटे जिन्हें वो खरा सिक्का समझती थी उसकी खोज ख़बर तक नहीं ली थी । कुसुम के दिल से रजनी के लिए हर समय दुआ निकलती रहती थी जबकि रजनी को उसने अपनी जायदाद में से एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी थी। बल्कि उसकी शादी में एक रुपया भी खर्च नहीं किया था दहेज के नाम पर एक कटोरी तक नहीं दी थी।
रजनी ने जब पंद्रह वर्ष पूर्व राकेश से प्रेम विवाह किया था तब उसकी माँ कुसुम बहुत नाराज हुई थी माँ होते हुए उसने यह तक कह दिया था कि ऐसी बेटी को तो जहर देकर मार देना चाहिए उसके प्रेम विवाह से उसका भाई रितेश और भाभी रीना भी खूब नाराज थे सब यही कह रहे थे कि रजनी ने पूरे खानदान की नाक कटा दी। रजनी के पिता राजेन्द्र जी ने चुप्पी साथ ली थी घर के सभी लोग उनसे यही कह रहे थे कि उधिक लाड़ प्यार में उन्होंने रजनी को बिगाड़ा है जो उसने ऐसा काम किया रजनी ने जब राकेश से प्रेम विवाह किया तब उसके कुछ दोस्त तथा रजनी की दो सहेलियाँ ही साथ थीं रजनी की माँ कुसुम ने रजनी के लिए अपने घर के द्वार हमेशा के लिए बंद कर दिए थे। रजनी की किस्मत अच्छी नहीं थी जिस राकेश के कारण उसने सबको ठुकरा दिया था वही राकेश उसके साथ दुर्व्यवहार करने लगा था अक्सर शराब के नशे में आकर वो रजनी के साथ मारपीट करता था रजनी बहुत दुखी रहने लगी थी मायके जा नहीं सकती थी उसके दुखड़े सुनने वाला कोई नहीं था । और फिर एक दिन वो भी आया जब राकेश ने रजनी को घर से निकाल दिया रजनी ऐसे में कहाँ जाती उसके पास कुछ रुपये थे उन रुपयों के दम पर वो रेल्वे स्टेशन पर आ गई उसे ऐसे में अपनी पक्की सहेली निशा का ख्याल आया उसकी शादी दिल्ली में विकास के साथ हुई थी विकास एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर था पिछली बार जब निशा आई थी तब रजनी को दिल्ली आने का न्यौता देकर गई थी उसने अपना फोन नंबर भी दिया था ट्रेन आने में अभी देर थी उसने निशा को फोन लगाकर कहा मैं सुब्ह नौ बजे दिल्ली पहुँच रही हूँ निशा बोली अचानक दिल्ली आने का कार्यक्रम कैसे बन गया और कौन कौन आ रहा है रजनी बोली मैं अकेली आ रही हूँ सारी बातें आकर बताऊँगी निशा समझ गई की सब कुछ ठीक नहीं है उसने रजनी से कहा आ जा नौ बजे तेरे जीजा तुझे स्टेशन पर मिलेंगे यह बात सुनकर रजनी को बड़ी राहत मिली रजनी ने जनरल डिब्बे का टिकट लिया था संयोग से उस समय भीड़ नहीं थी इसलिए रजनी को आराम से सीट मिल गई थी। दिल्ली स्टेशन पर रजनी को विकास मिल गए वे कार लेकर रजनी को लेने आए थे रजनी के पास एक पर्स के अलावा और कोई सामान नही था। एक घंटे बाद रजनी निशा के घर पहुँची घर बहुत अच्छा था और काफी बड़ा था निशा उससे गले मिली और बहुत खुश हुई पर रजनी की हालत देख बेचैन हो गई रजनी ने जब पूरी बात सुनाई तो निशा को बहुत दुख हुआ रजनी बोली मैं और कहाँ जाती एक तेरा ही सहारा मुझे नजर आया और यहाँ आ गई निशा ने कहा तूने बहुत अच्छा किया है अब यहाँ जब तक जी चाहे रह तेरे रहने से हमें बहुत खुशी होगी । पर रजनी किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी उसने बी बी ए किया था रजनी के बहुत आग्रह पर विकास ने रजनी के लिए नौकरी ढूँढ दी थी असिस्टेण्ट मैनेजर का पद था वेतन भी ठीक ठाक था। रजनी ने तुरंत नौकरी ज्वाइन कर ली तथा वुमेन्स होस्टल में अपने रहने की व्यवस्था कर ली निशा ने खूब मना किया पर रजनी मानी नहीं। होस्टल में रहते हुए रजनी को पूरे बारह साल हो गए थे नौकरी करते हुए उसने कार भी खरीद ली थी और बड़े ठाट से रह रही थी । अब वो खुद मैनेजर बन गई थी ।एक दिन वो सुब्ह काली मंदिर गई थी वहाँ पर उसे भिखारियों के बीच एक बूढ़ी विकलाँग भिखारन दिखाई दी वो रजनी को कुछ पहचानी सी लगी करीब जाकर देखा तो रजनी को अपनी माँ कुसुम उसमें मिली कुसुम कुछ बताने को तैयार नहीं थी पर रजनी के अपनेपन से उसने बताया कि वो पिछले पंद्रह दिनों से यहाँ है यहाँ भरपेट खाना मिल जाता है फुटपाथ पर सो जाते हैं तेरे पिता के हार्ट अटेक से निधन हो जाने पर रोहित और उसकी बहू ने मकान दुकान जमीन जायदाद पर कब्जा कर लिया मुझसे कागजात पर पहले ही दस्तखत करा लिए थे दुर्घटना में एक पैर गँवाने के बाद में बेबस हो गई थी बहू बेटे से कह रही थी माँ को घर से निकाल दो या फिर मुझे छोड़ दो रोहित ने मुझे ही घर से निकाल दिया काली मंदिर पर मुझे छोड़कर जो गया तो फिर वापस नहीं आया रजनी ने माँ को सांत्वना देते हुए कहा माँ मैं हूँ तो सही मैं देखभाल करूँगी तुम्हारी इसके बाद रजनी ने होस्टल छोड़कर ये फ्लेट किराये से ले लिया जिसमें दोनों माँ बेटी सुखपूर्वक रह रही थीं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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