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कहानी: ज़िंदगी की और

देवीलाल और ललिताबाई के विवाह के पूरे पच्चीस साल हो गए थे बेटी सुषमा तथा बेटे सुरेश की भी शादी उन्होंने कर दी थी। यह पच्चीस साल उन्होंने हर तरह की परिस्थिति का सामना कर गुजारे थे। दोनों पति पत्नी मिलकर दूध डेयरी चलाते थे जिससे उनके परिवार का भरण पोषण ठीक से हो जाता था। उनका मकान बड़ा था जिसमें दो किरायेदार भी रहते थे लड़का सुरेश ठेकेदार था वो भी उनके साथ रहता था उसकी शादी को अभी साल भर ही हुआ था।
पच्चीस साल पहले देवीलाल ज़िंदगी से निराश होकर आत्महत्या करने के इरादे से जंगल में आए थे। उनकी उम्र तीस वर्ष होने जा रही थी माता पिता दोनों सड़क दुर्घटना में मारे गए थे। वे अपने चाचा के पास रह रहे थे। चाचा उनकी शादी करने में रुचि नहीं ले रहे थे उन्हें डर यह था कि शादी के बाद देवीलाल अलग हो जाएगा अभी जो वो देवीलाल की कमाई पर मजे कर रहे हैं वो खत्म हो जाएँगे। देवीलाल को निराशा ने घेर लिया था उन्हें जीवन जीना कठिन लग रहा था। यही सोचकर वे जंगल में रस्सी लेकर फाँसी पर लटक कर अपने जीवन को खत्म करने आए थे। रात के दो बज रहे थे वे फाँसी लगाने से पहले बैठकर कुछ सोच रहे थे तभी नदी में किसी के कूदने की आवाज आई देवीलाल ने देखा एक महिला नदी में डूब रही है। देवीलाल नदी में कूद गए उन्हें अच्छे से तैरना आता था। वो उसे डूबने से बचाकर किनारे पर ले आए जब वह थोड़ी ठीक हुई तो देवीलाल ने उनसे बात की वो महिला जिसका नाम ललिता था कहने लगी मुझे क्यों बचाया मैं तो मरना चाहती थी देवीलाल जी ने जब इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि मेरे पति राजेन्द्र मुझे प्रताड़ित करते थे शादी के आठ साल होने के बाद भी मुझे कोई बच्चा नहीं था यह बात उन्हें बहुत भारी लगती थी इससे ललिता भी दुखी रहती थीं। आज भी उसके पति ने उसे बेरहमी से मारा था और घर से निकाल दिया था। ऐसे में सिवाय मरने के मेरे मन में और कुछ विचार नहीं आ रहा था इसलिए मैं नदी की तरफ आई थी अगर तुम नहीं होते तो मैं कभी की मर गई होती। तब देवीलाल ने कहा मैं भी मरने के लिए ही आया था। मैं फाँसी पर लटकना चाहता था। तैरना आने के कारण डूबना मुमकिन नहीं था इसलिए मैं फाँसी लगाकर मरना चाहता था। वे दोनों वहीं बैठकर बहुत देर तक बातें करते रहे फिर देवीलाल ललिता को अपने साथ ले आए थे फिर मंदिर में जाकर उन्होंने आपस में विवाह कर लिया था। इसके बाद देवीलाल चाचा के घर नहीं गया बल्कि दोनों शहर के दूसरे छोर पर  कमरा किराये से लेकर साथ रहने लगे थे। तबसे लेकर अब तक फिर उनके मन में आत्महत्या का विचार जरा देर  के लिए भी नहीं आया था। आज वे सुख से रह रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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