सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: तीसरा सुख

संसार में कई प्रकार के सुख बताए गए हैं जिसमें अच्छी पत्नी को तीसरा सुख कहा है पियूष की पत्नी रेवती बहुत अच्छे स्वभाव की थी जिसे पाकर पियूष अपने आपको भाग्यशाली समझता था। पहला सुख निरोगी काया को कहा है जो एक्सीडेंन्ट के बाद से उसे प्राप्त नहीं हुआ था। दूसरा सुख धन दौलत को कहा है जो उसकी बीमारी के कारण उसके पास नहीं थी। पर जो उसे पत्नी के रूप में तीसरा सुख मिला था उसे पाकर वो बहुत ख़ुश था।
पियूष की शादी रेवती से बारह वर्ष पूर्व हुई थी। उस समय रेवती बीस वर्ष की थी और पियूष इक्कीस वर्ष का उसने बी कॉम किया था। माता पिता ने मजदूरी करके उसे पाला पोसा पढ़ाया लिखाया था। उसकी नौकरी लगी नहीं थी इसलिए वो भी अपने पिता चमनलाल के साथ मजदूरी करने लगा था उनके साथ रेवती की माँ कमला भी मजदूरी कर रही थी उसे पियूष अच्छा लड़का लगा उसने रेवती से पियूष के रिश्ते की बात चमनलाल से कही तो चमनलाल फौरन मान गए। पियूष भी इससे खुश हुआ क्योंकि रेवती कभी कभी दिन में माँ के लिए खाना लेकर आती थी तब रेवती की थोड़ी बहुत बात चमनलाल से भी होती थी। पियूष को भी वह अच्छी लगती थी। दोनों की शादी हो गई सब बहुत खुश थे, अब रेवती भी मजदूरी करने जाने लगी थी उनका परिवार मजदूर वर्ग से था जिसमें घर के सभी बालिग सदस्य मजदूरी करते थे। शादी के कुछ दिन बाद रेवती ने अपने पति पियूष से कहा आपने तो बी कॉम किया है। आप अच्छी नौकरी क्यों नहीं ढूंढ लेते पियूष को भी बात जमी उसका गाँव कुशलपुरा इंदौर के पास ही था। उसका एक मित्र राजेश कंपनी में काम करता था। उसने पियूष को मार्केटिंग में जॉब दिलवा दी। पियूष अकेला इन्दौर में रह रहा था उसका काम ऐसा था जिसमें उसे सुबह आठ बजे से रात के साढ़े नौ बजे तक फुर्सत नहीं मिलती थी। हाँ, वेतन के अलावा  कुछ सेल्स बढ़ाने पर कमीशन भी मिलता था। जब उसकी अच्छी कमाई होने लगी तो उसने किराये का कमरा छोड़कर किराये से फ्लेट ले लिया तथा रेवती को  गाँव से शहर ले आया रेवती ने बड़ी जल्दी अपने आपको शहर के माहौल में ढाल लिया। वो आठवीं तक पढ़ी थी उसे कपड़े सिलने का बड़ा शौक था। उसने सिलाई सीखी भी थी। काम करना उसे अच्छा लगता था, वो सिलाई मशीन अपने साथ लाई थी। उसका बच्चा सोनू भी साल भर का हो गया था। घर का काम बहुत थोड़ा था, बाकी पूरे दिन फुर्सत रहती थी। घर में तब खुशी आती जब पियूष रात के साढ़े नौ बजे घर आता। आखिर एक दिन उसने पियूष से कह ही दिया कि नीचे जो शॉपिंग सेंटर है उसमें सीढ़ी के बीच एक बहुत छोटी दुकान है जो अभी खाली है उसका किराया भी कम है क्यों न मैं वहाँ अपनी सिलाई मशीन रखकर सिलाई का काम शुरू कर दूँ।  पियूष ने थोड़ी बहुत ना-नुकर करने के बाद उसे स्वीकृति दे दी। उसकी दुकान चल निकली, उन्हें फ्लेट में रहते हुए आठ वर्ष हो गए थे। सोनू चौथी में पढ़ रहा था और फ्लेट में आने के बाद जन्मी बिटिया कक्षा एक में पढ़ रही थी। पियूष के पास कार थी और एक स्कूटी भी जिसे अक्सर रेवती चलाती थी। रेवती ने अपनी दुकान नहीं छोड़ी थी। उससे उसकी अच्छी कमाई हो जाती थी। जिसकी बदौलत वे जिस फ्लेट में किराये से रहते थे, वो उन्होंने खरीद लिया था। वे सुखी जीवन जी रहे थे लेकिन होनी को यह मंजूर नहीं था। मार्केटिंग के काम से पियूष अपने सहयोगी पराग के साथ मोटरसायकिल से जा रहे थे कि एक कार से उनका भीषण एक्सीडेन्ट हो गया। हादसा इतना बड़ा था कि उसमें मोटर सायकिल चला रहे पराग की तो वहीं मौत हो गई थी। और पियूष गंभीर रूप से घायल हो गया था। पूरे डेढ़ साल से उसका इलाज चल रहा था। वो चलने फिरने से मोहताज था। दर्द उसका चौबीसों घंटे बना रहता था। बस व्हीलचेयर पर बैठ जाता  था लेकिन वो उसे चला नहीं पाता था। इन डेढ़ वर्षों में उनकी सारी जमा पूँजी खर्च हो गई थी। रेवती ने हिम्मत नहीं खोई थी। वो पूरी तरह से पियूष की देखभाल भी कर रही थी और उसका इलाज भी करा रही थी। सिलाई  मशीन पर वह काम कर ही रही थी। इसके अलावा उसने अपनी दुकान पर कपड़ा भी रखना शुरू कर दिया था। अब उनकी आमदानी का जरिया वो दुकान ही थी। बच्चे इतने बड़े तो हो गए थे कि अपना काम कर सकें और पियूष की देखरेख भी कर लें। रेवती अपने पति पियूष  की अच्छी सेवा कर रही थी यही तीसरा सुख था जो सब सुखों से अच्छा था।



*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...