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कहानी: बंजर जमीन

हरिकिशन  के हिस्से में जो चालीस एकड़ बंजर जमीन आई थी आज वही जमीन उनके लिए वरदान साबित हुई थी उस जमीन का दस एकड़ फ्रंट हाईवे पर था पूरी जमीन पर उन्होंने शॉपिंग सेन्टर बनाया था तथा उससे लगी हुई चालीस एकड़ जमीन और खरीद ली थी जिस पर वे उन्नत खेती कर रहे थे शाँपिंग सेन्टर से दो करोड़ रुपये प्रतिमाह की आय हो रही थी जिससे उनके दोनों बेटे नितिन और जतिन अच्छे से जीवन यापन कर रहे थे दोनों बिल्डर भी थे उससे भी उनकी अच्छी कमाई हो रही थी।  
बीस वर्ष पूर्व जब हरिकिशन के जमीन के बँटवारे में यह बंजर जमीन मिली थी तब वे बहुत चिंतित और दुखी हुए थे सोच रहे थे कि इस जमीन में कैसे खेती करेंगे उनके  पिताजी श्रीकिशन ने उसमें दस जगह पर नलकूप खनन कराए थे पर किसी में भी पानी नहीं निकला था पूरी जमीन सूखी थी उसमें बारिश की एक ही फसल हो सकती थी अगर बारिश ठीक न हो तो वो फसल भी सूखने लगती थी उनके बड़े भाई रामकिशन ने हिस्से में नदी किनारे की बीस एकड़ उपजाऊ और सिंचित जमीन ली थी वो अपने पिता श्रीकिशन को यह बात समझाने में सफल हो गए थे कि हरिकिशन की जमीन अगर सूखी है तो उसको दुगुनी जमीन मिल तो रही है। लेकिन सब यही कह रहे थे कि रामकिशन ने अपने छोटे भाई के साथ घोर नाइंसाफी की है वो इस सूखी बंजर जमीन का क्या करेगा जिसमें सिवाय घास के कुछ नहीं उगता बँटवारे के बाद  श्री किशन तो इस दुनिया से चले गए लेकिन इसके बाद घर दो हिस्सों में बँट गया रामकिशन को पाँच सौ क्विंटल गेहूँ और दो सौ क्विंटल सोयाबीन का उत्पादन हुआ था। जबकि हरिकिशन के खेत से मात्र सत्तर क्विंटल सोयाबीन का उत्पादन सुआ था उनकी तो लागत भी नहीं निकली थी एक तरफ रामकिशन और उनके बच्चे मौज कर रहे थे दूसरी तरफ हरिकिशन और उनके बच्चों का जीवन यापन कठिनता से हो रहा था हरिकिशन खुद्दार इंसान थे ना उन्होंने भाई से सहायता माँगी न उनके भाई ने उनकी सहायता की हरिकिशन के ससुर जीवनलाल ने उन्हें दो दुधारू भैंस दीं जिनका दूध बेचकर के वो अपना गुजारा कर रहे थे। समय एक सा नहीं रहता सबके दिन बदलते हैं। तीन साल तक रामकिशन को खेती से भरपूर फसल मिलती रही इसके बाद सरकार ने नदी पर बाँध बनाने की मंजूरी दे दी रामकिशन की पूरी जमीन डूब में आ गई थी सरकार ने उनकी पूरी जमीन का अधिग्रहण कर लिया था। मुआवजा उन्हें अच्छा मिला था मुआवजे की राशि से उन्होंने चालीस किलोमीटर दूर सत्तर एकड़ जमीन खरीद ली थी। पर जब वो उस जमीन पर बोनी करने गए तो गाँव वालों ने उन्हें बौनी नहीं कर दी उस जमीन पर बेचने वाले के परिजनों ने कब्जा कर लिया था वे कब्जा छोड़ने से इंकार कर रहे थे हारकर वे अपनी जमीन छोड़कर वापस अपने गाँव आ गए यहाँ उन्होंने छोटी सी दुकान खोल ली थी उससे जो कुछ थोड़ा रूपया
वे कमाते उसी में घर का खर्च चला रहे थे। इधर जब नया बायपास बना तो हरिकिशन की जमीन उसके सामने आ गई थी वहीं सरकार ने औद्योगिक श्रेत्र के लिए आठ सौ एकड़ जमीन विभिन्न उद्यमियों को आवंटित कर दी थी  जिसमें कई प्रकार के उद्योग वहाँ खुल गए थे आसपास  देखते ही देखते कई आवासीय कॉलोनियाँ बन गई थीं। हरिकिशन के बेटे जतिन ने सिविल इंजीनियरिंग में बी ई किया था उसने वहाँ अपना दफ्तर खोल लिया था नितिन ने आसपास की जमीन खरीदकर कॉलोनियाँ विकसित करना शुरू कर दी थीं हरिकिशन जी ने अपनी जमीन को कामर्शियल सेन्टर में बदल लिया था बाँध बँध जाने से अब उनकी जमीन बंजर नहीं रह गई थी जो अपनी जमीन के पीछे उन्होंने चालीस एकड़ जमीन खरीदी थी वो खूब उपजाऊ निकली थी जिससे हरिकिशन के सुनहरे दिन आ गए थे वहीं रामकिशन की हालत भिखारियों जैसी हो गई थी। अब वे हरिकिशन के सामने तिल के बराबर भी नहीं रह गए थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

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