सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: मायके वाले

सिंचाई विभाग के बड़े बाबू राजेन्द्र जी आज बड़े दुखी थे अपने जिस छोटे भाई दीपक को उन्होंने पढ़ा लिखाकर इंजीनियर बनाया था आज वो जेल में था और जो उसके ससुराल वाले सबसे बड़े हिमायती बन ते थे उन सभी ने उससे कन्नी काट ली थी जिस पत्नी के कहने पर दीपक ने भ्रष्टाचार किया था वो उसे छोड़ गई थी उसके मायके वाले उसकी दूसरी शादी करने वाले थे दीपक से हुए दोनों बच्चे वो लावारिस छोड़ गई थी जिसे राजेन्द्र बाबू अपने घर ले आए थे तथा उनकी पढ़ाई लिखाई जारी रख रहे थे।आज राजेन्द्र बाबू जेल में दीपक से मिलकर आए थे दीपक की आँखों में आँसू थे वह कह रहा था भैया मैं तो इस योग्य भी नहीं रहा कि आपसे माफी भी माँग सकूँ इस पर राजेन्द्र जी ने कहा था माफी की जरूरत नहीं है वक्त पर अपने ही तो काम आते हैं।
आज राजेन्द्र बाबू को वो समय याद आ रहा था जब दीपक आठवीं में पढ़ रहा था और उन्होंने बारहवीं की परीक्षा दी थी तभी उनके पिताजी रेवाराम जो मिस्त्री का काम करते थे वे अचानक तीन मंजिला निर्माणाधीन भवन से नीचे गिर गए जिससे अनकी दुखद मौत हो गई ये भवन ई ई आलोक सर का बन रहा था उन्होंने तरस खाकर राजेन्द्र जी को सिंचाई विभाग में दैनिक वेतन भोगी बना दिया उनकी ड्यूटी ऑफिस में लगाई गई थी उनका रिजल्ट भी आ गया था और वे प्रथम श्रेणी में हायर सेकेण्डरी में पास हुए थे उनका एडमीशन बड़े कॉलेज में हो रहा था लेकिन उन्होंपे अपनी नौकरी नहीं छोडी थी ई ई आलोक साहब उन्हें परमानेन्ट कर गए थे। अब उनका एकमात्र लक्ष्य था दीपक को पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बपाना राजेन्द्र जी ने अपने वेतन से दोपक की पढ़ाई पूरी कराई वो इंजीपियर बन गया था सिंचाई विभाग में उसकी नौकरी असिस्टेण्ट इंजीपियर के पद पर लग गई थी। दीपक की शादी के लिए कई बड़े घरों से रिश्ते आ रहे थे । राजेन्द्र बाबू ने दीपक की शादी रोशनी से तय कर दी थी रोशनी दीपक की बहू बनकर आ गई थी रोशनी के विचार अलग थे वह पैसे को ज्यादा महत्व देती थी। शादी के कुछ दिन बाद उसने दीपक से कहा इंजीनियर होकर भाई के साथ इस छोटे से क्वार्टर में क्यों रहते हो जब शासन की तरफ से आपको बंग्ला मिल सकता है तो और आखिर वही हुआ जो रोशनी ने चाहा था दीपक ने सरकारी बंग्ला ले लिया था। उस बंग्ले पर रोशनी के मायके वाले जमे रहते थे दीपक के घर का वो एक परिंदा भी फटकने नहीं देती थी राजेन्द्र बाबू ईमानदार इंसान थे उनके होते हुए दीपक रिश्वत नहीं ले सकता था एक दिन जब राजेन्द्र बाबू ऑफिस गए तो पता चलि कि उनका तबादला हैड ऑफिस में हो गया है जब उन्हें यह पता चला कि यह तबादला उनके अपने सगे भाई दीपक ने कर वाया है तो उन्हें बड़ा दुख हुआ उन्होंने चुपचाप आदेश ले लेया और हेडऑफिस में ज्वाइन चर लिया राजेन्द्र बाबू के जाते हो दीपक ने छूब खुशियाँ मनाई अब दीपक को रोकने वाला कोई नहीं था राजेन्द्र बाबू के जाते ही दीपक ने खुलकर भ्रष्टाचार किया वो सारा पैसा रोशनी मायके भिजवाने लगी थी पर दीपक उससे कुछ नहीं कहता था आखिर पाप का घडा एक दिन तो भरता ही है दीपक पर बिजिलेंस की नजर पढ़ी और एक दिन वो रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया फिर तो उसके भ्रष्टाचार के सारे कारनामें उजागर हो गए छापा रोशनी के मायके पर भी पड़ा जहाँ से भारी मात्रा में नगदी प्राप्त हुई थी दीपक को जेल हो खई थी रोशनी की दूसरी शादी तय हो गई थी रोशनी ने अपनी तीन साल की बेटी ऋचा तथा छः साल के बेटे ऋषभ को हमेशा के लिए छोड़ दिया था दोनों बच्चों को राजेन्द्र और उनकी पत्नी माँ बाप का प्यार दे रहे थे।
*****


रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...