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कहानी: मतलबी लोग

धर्म वीर जबसे प्रदेश के केबिनेट मंत्री बने थे तभी से उनके इतने सारे रिश्तेदार भाई बंधु प्रगट हो गए थे कि वो खुद चकित थे जिन्हें कभी देखा नहीं जिनका कभी नाम नहीं सुना वे अपने अत्यंत निकट का सगा संबंधी बतला रहे थे । रोज उनके बंग्ले पर ऐसे लोगों की बड़ी संख्या होती थी। रिश्ता निकालने के बाद फिर उनका फायदा उठाने की बात करते कोई कहता नौकरी लगवा दो कोई कहता ठेका दिलवा दो कोई कहता मेरा मुकदमा खत्म करा दो इसके अलावा और भी ऐसे काम कराने की बात करते जो उनकी निष्कलंक छवि को कलंकित कर दे। हारकर आज धर्मवीर जी ने संतरी से कह ही दिया कोई भी मेरा रिश्तेदार बनकर आए उसे मत आने देना मैं अपने किसी रिश्तेदार से मिलना नहीं चाहता ना ही उनसे कोई संबंध रखना चाहता हूँ। 
धर्मवीर जी बरखेड़ा गाँव के रहने बाले थे पन्द्रह साल पहले उनके पिताजी कनीराम ने उन्हें घर से निकाल दिया था और जमीन जायदाद से भी बेदखल कर दिया था तब न किसी गाँव वाले ने न उनके किसी रिश्तेदार ने उनकी कोई मदद की थी वे एक जोड़ी कपड़े और टूटी चप्पले पहन कर सत्तर किलोमीटर चलकर भोपाल आए थे। इस बीच उन्होंने कितनी तकलीफ उठाई थी ये वे ही जानते थे भोपाल आते ही वे सत्ताधारी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष मोहनलाल जी से मिलने उनके निवास पहुँचे मोहनलाल जी के साथ छ़ः महीने पूर्व चुनाव प्रचार के दौरान वे पाँच दिन रहे थे और उनकी सेवा से दिल जीत लिया था तब मोहनलाल जी ने कहा था कि अगर जरूरत पड़े तो निस्संकोच मुझसे मिलने आ जाना उनकी इसी बात को ध्यान में रखकर वे मोहनलाल जी से भिलने आए थे मोहनलाल जी उन्हें देखते ही पहचान गए तथा उनकी हालत देख कर यह भी जान गए की उनकी परिस्थिति अच्छी नहीं है । सबसे पहले उन्होंने धर्मवीर जी को भोजन कराया फिर नए जूते और कपड़े दिलवाए इसके बाद बैठकर उनसे विस्तार से चर्चा की धर्मवीर ने कहा कि मेरे पिताजी ने ही मुझे घर से निकाल दिया मेरी सज्जनता उन्हें अच्छी नहीं लगी किसी गाँववाले ने भी मेरा साथ नहीं दिया। इस पर मोहनलाल जी बोले हमें आपकी सज्जनता बहुत अच्छी लग रही है हमें ईमानदार और योग्य व्यक्ति की तलाश थी जो अब आपके आने से वो पूरी होने वाली है मोहनलाल जी ने पार्टी के प्रदेश कार्यालय का प्रभारी बना दिया था। लाखों रुपये का फंड उनके पास आ गया था पर धर्मवीर जी की ईमानदारी एक पैसा भी इधर से उधर नहीं होने देती थी वे एक कुशल प्रबंधक साबित हुए थे चुनाव में पार्टी के प्रदेशाथ्यक्ष मोहनलाल जी ने ही उन्हें विधान सभा चुनाव में में टिकट दिलवाया था। उनके निर्वाचन क्षेत्र में बरखेडा भी शामिल था वे लोग धर्मवीर जी को उम्मीदवार बनाए जाने से खुश नहीं थे चुनाव में बरखेड़ा गाँव से उन्हें एक भी वोट नहीं मिला था उनके विरोधी को बारह सौ वोट मिले थे फिर भी उसकी जमानत जप्त हो गई थी जबकि धर्मवीर जी भारी बहूमत से जीते थे विधायक रहकर उन्होंने जनता की जो सवा की थी उससे वे तीसरी बार भी विधायक चुने गए थे इस बार उन्हें केबिनेट मंत्री बना दिया गया था उनके केबिनेट मंत्री बनते ही उनके रिश्तेदारों की फौज खड़ी हो गई थी उनके भाई पर भी वन अपराध का केस चल रहा था वो भी उनसे मिलने आया था उसे भी उन्होंने मना कर दिया कहा कानून अपना काम कर रहा है और मैं तुम्हारी सिफारिश कभी नहीं करूँगा। भाई अपना सा मुँह लेकर चला गया था। धर्मवीर जी जब घोर परेशानी में थे तब रचना ने उनका पूरा साथ दिया था रचना नगर निगम में नौकरी करती थी । रचना ने धर्मवीर जी से प्रेमविवाह किया था और उनके संघर्ष के दिनों का सहारा बनी थी धर्मवीर उसे ही अपने सबसे निकट मानते थे । रचना भी उनकी ईमानदारी में उनका पूरा साथ देती थी अब भी दे रही थी। उनकी ईमानदारी से पार्टी में उनकी छवि दिन ब दिन मजबूत होती जा रही थी जो उनके लिए ख़ुशी और संतुष्टी की बात थी।  
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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