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कहानी: अंधविश्वास

अंधविश्वास के फेर में पढ़कर अपने इकलौते जवान पुत्र अभिषेक को खो चुके अमित वर्मा से सबक लेकर उनके मित्र अशोक ने अपने पुत्र नीलेश का इलाज डॉक्टर से कराया था और अब वो पूर्णतः स्वस्थ हो गया था आज अमित जब अशोक जी से मिलने आए तो यही कह रहे थे आपने बहुत अच्छा किया जो नीलेश का इलाज डॉक्टर से कराया आपने वो गलती नहीं की जो मैंने की मैं अंधविश्वास के जाल में फँसकर अपने बेटे को लेकर बाबाओं के चक्कर ही लगाता रहा साल भर में पूरे पैंतीस लाख रुपये फूँक डाले फिर भी अपने बेटे की जान नहीं बचा सका अब अपने बेटे की आखिरी निशानी मेरा पोता  नवीन को पाल रहे हैं अभिषेक की पत्नी अर्पिता ने तो शादी कर ली थी और अपने बेटे नवीन को हमेशा के लिए हमारे पास छोड़ गई।
अमित के जाने के बाद अशोक उन्हीं के ख्यालों में खोए हुए थे अभिषेक अमित का इकलौता बेटा था। वो बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहा था अच्छी तनख्वाह थी उसकी शादी हो गई थी तथा उसका चार साल का बेटा नवीन था सब कुछ ठीक चल रहा था अमित सेवानिवृत्त हो गए थे उन्हें पेंशन मिल रही थी मकान उनके पास था ही फंड और ग्रेच्यूटी के उन्हें अड़तीस लाख रुपये मिले थे जो उन्होंने बैंक में जमा कर दिए थे सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक एक दिन अभिषेक को पेट दर्द होने लगा पेट दर्द उसे असहनीय रूप से हो रहा था अमित जी उसे लेकर अस्पताल गए वहाँ इलाज चला जब कोई लाभ नहीं हुआ तो दूसरे अस्पताल ले गए वहाँ डॉक्टरों ने उसकी बहुत जाँच करवाई पर कुछ नहीं निकला वे समझ ही नहीं पा रहे थे कि अभिषेक को आखिर बीमारी क्या है, किस कारण से उसके पैट में दर्द हो रहा है। अमित निराश होकर बैठे हुए थे तभी किसी मित्र ने उन्हें किसी बाबा का पता दिया जो भभूत से अनेक असाध्य बीमारियों के इलाज का दावा करते थे बाबा के यहाँ लोगों की बड़ी भीड़ थी वे दोनों हाथों से रुपया बटोर रहे थे। इनका नंबर पूरे आठ घंटे बाद आया था अमित जी ने पच्चीस रुपये की पर्ची कटाई थी। जिसके बदले में बाबा ने छः भभूति की पुड़िया दी थीं तथा कहा था कि तीन दिन में ये पूरी तरह ठीक हो जाएगा। इसके बाद पन्द्रह दिन अभिषेक ठीक रहा पर फिर उसे तीव्र पेट दर्द होने लगा। वे उसे लेकर फिर बाबा के पास पहुँचे बाबा ने कहा एक लाख इक्यावन हजार रुपये जमा करा दो ये शर्तिया ठीक हो जाएगा। अमित जी ने चाही गई सारी रकम अदा कर दी फिर भी आराम नहीं मिला अब बाबा चार लाख रुपये माँग रहा था। कि तभी किसी ने अमित जी को दूसरे बाबा का पता दे दिया ये अभिषेक को उस बाबा के पास ले गए बाबा ने प्रेत बाधा बताई तथा अभिषेक की जंजीरों से पिटाई की  दो दिन उसे खाना नहीं दिया गया उसकी हालत खराब हो रही थी पिटाई ने और भूख ने उसे बेहाल कर दिया था। उस बाबा ने भी बहुत से रुपये अमित जी से ऐंठ लिए थे  वहाँ थोड़ा आराम लगा पर दो दिन बाद फिर दर्द शुरू हो गया। अब वे फिर एक बाबा के पास गए जो गाँव से दूर एक मकान में रह रहा था। उसके पास भी लोगों की बड़ी भीड़ थी। उन्होंने चार पुड़िया में कोई दवा दी जो खाली पेट खाना था। उससे अभिषेक का पेट दर्द तो बंद हो गया पर अब उसे डायरिया हो गया था। अभिषेक की बीमारी को सालभर हो गए थे उसकी हालत बहुत खराब हो गई थी। अब वो ठीक से चल फिर भी नहीं पा रहा था ऐसी हालत में अमित जी फिर उसे किसी बाबा के पास लेकर गए थे वहाँ से वे लौटकर आ रहे थे कि रास्ते में अभिषेक की हालत बहुत ज्यादा बिगड़ गई। थोड़ी देर तड़पने के बाद उसने प्राण त्याग दिए थे। अंधविश्वास के फैर में अमित जी का सारा पैसा खर्च हो चुका था अब उनके पास पेंशन ही बची थी। अभिषेक की पत्नी अर्पिता ने अभिषेक के निधन के छः महीने बाद ही दूसरी शादी कर ली थी अपने बेटे को उसने अमित जी के पास छोड़ दिया था। इसके बाद अशोक जी के पुत्र नीलेश को भी पेट दर्द की बीमारी ने घेर लिया था। लेकिन अशोक जी ने बाबाओं के फेर में पड़ना उचित नहीं समझा आठ अस्पताल बदलने के बाद भी नीलेश को आराम नहीं मिल रहा था। उनके इलाज में ढाई लाख रुपये खर्च हो गए थे  उन्हें यह डर सता रहा था कि कहीं इसका हाल भी अभिषेक जैसा न हो जाए तभी एक दिन किसी ने उन्हें बताया की करीम नगर के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर सतीश जी हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे तथा एक छोटा सा क्लीनिक खोलकर मरीजों को देख रहे थे तथा उनसे नाम मात्र की फीस ले रहे थे। अशोक जी नीलेश को दिखाने वहाँ ले गए सतीश जी ने नीलेश का अच्छी तरह परीक्षण किया और दो सौ चालीस रुपये की दवाएँ लिख दीं जो पन्द्रह दिन का कोर्स था अशोक जी बोले और दवाएँ बढ़ाना हो तो बताएँ। जिस पर सतीश जी थोड़े नाराज होकर बोले जो दवाएँ लगेंगी वही तो लिखूँगा। पन्द्रह दिन बाद फिर नीलेश एक बार और सतीश जी के पास गए डॉ साहब ने पंद्रह दिन की दवाएँ और लिख दीं तथा कहा कि अब यहाँ आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। डॉक्टर साहब ने जो कहा वो सौ फीसदी सही निकला नीलेश पूरी तरह स्वस्थ हो गया था और बहुत खुश रहने लगा था। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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