रामनिवास सरकारी कर्मचारी थे उन्हें कार्डिएक अरेस्ट आया तब वे प्राइवेट अस्पताल में तीन महीने भर्ती रहे थे जिसमें उनके पन्र्द्रह लाख रुपये खर्च हो गए थे लेकिन शासन द्वारा बिल में काटछाँट कर तीन लाख रुपये ही मंजूर किए गए थे इसकी लिए उन्हें काफी दौड़धूप करना पड़ी थी जब उन्हें ट्रेजरी से बिल का भुगतान मिला तब तक उनके पचास हज़ार रुपये इस पूरी प्रक्रिया में खर्च हो चुके थे। आयुष्मान योजना का उन्हें कोई लाभ नहीं मिला था।
इस संबंध में उनके एक साथी कर्मचारी ने बात करते हुए कहा कि आप को तो फिर भी तीन लाख रुपये मिल गए भले ही आपके पल्ले ढाई लाख रुपये ही पढ़े हों पर चपरासी कमला बाई को तो एक रुपया तक नहीं मिला उनकी आँतों में इन्फेक्शन हुआ था वे भी डेढ़ महीने अस्पताल में भर्ती रहीं थी उनके आठ लाख रुपये खर्च हुए थे उनके लड़के नरेश ने खूब कोशिश की दस हजार रुपये भी खर्च कर दिए पर उनका बिल उस बाबू ने जब तक दबाए रखा जब तक कि क्लेम की डेट नहीं निकल गई नरेश जब बिल की जानकारी लेने वरिष्ठ कार्यालय गया तब पता चला कि बिल तो यहाँ आया ही नहीं इसके बाद नरेश जब संबंधित बाबू के पास पहुँचा तब उसने बड़ी मुश्किल से बिल निकाल कर दिया। पर अब वो बिल बेकार हो गया था उसे बाबू पर बहुत गुस्सा आ रहा था। नरेश की गलती सिर्फ इतनी थी की उसने उस बाबू को भेंट पूजा नहीं दी थी जिसकी कसर उसने बिल रोक कर निकाल ली थी। नरेश ने तैश में आकर कहा मैं आपकी शिकायत बड़े ऑफिस में करूँगा सुनकर बाबू मुस्कुराते हुए बोला शौक से करो मेरी शिकायत तुम मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकोगे। मैं तुम्हें हर तरह का नुक्सान पहुँचा सकता हूँ और तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। यह बात सुनकर नरेश को बहुत ज्यादा गुस्सा आया जिसे उसने बड़ी मुश्किल से काबू किया आज उसे अपनी ही बेबसी पर तरस आ रहा था । किसी ने उससे मीठा व्यवहार नहीं किया था। इसके बाद भी उसका काम नहीं हुआ था इसी बात का उसे दूखु था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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