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कहानी: भ्रमण कार्यक्रम के दौरान भोजन का खर्च

रोहित और उसके साथी गुजरात के भ्रमण के बाद पूरे बीस दिन बाद घर आए थे। यात्रा में जहाँ सभी के चालीस हज़ार रुपये खर्च हुए थे वहीं रोहित का खर्च कुल बीस हज़ार रुपये ही आया था। उसका एक सबसे बड़ा कारण यही था कि जहाँ सभी ने होटल रेस्त्रां में खाना खाया था नाश्ता किया था चाय पी थी वहीं रोहित ने अपने हाथों से खाना तैयार कर खाया था जो उसे सस्ता भी पड़ा था तथा हाईजेनिक तो था ही।
बीस दिन पूर्व जब वे भ्रमण कार्यक्रम बना रहे थे तब जो उन्होंने इनोवा किराये पर,ली थी उसमें छः लोग तो शामिल हो गए थे सिर्फ एक की कमी पड़ रही थी तब अशोक ने रोहित से संपर्क किया था रोहित तैयाय हो गया था वैसे अशोक की टीम रोहित को शामिल नहीं करना चाहती थी पर और कोई चारा भी नहीं था हाँलाकि सारे रोहित के परिचित थे पर रोहित के सिद्धाँत उन्हें पसंद नहीं थे। जिस दिन सब भोपाल से रवाना हो रहे थे उस दिन सबने देखा कि बेग के अलावा रोहित के पास कपढ़े का एक थैला भी था रोहन ने पूछा इसमें क्या है उसने कहा इसमें खाना बनाने की सामग्री और पाँच लीटर की गैस की टंकी है इस पर विनीत भड़क गया कहाँ खाना बनाओगे? कैसे बनिओगे ?हर जगह पर होटल हैं ढाबे हैं। उनमें खाना खा लेंगे विनीत ने कहा अशोक तुमने रोहित को शामिल कर बहुत बड़ी गलती की है देखना ये ऐसे ही हमें पकाएगा। फिर श्याम बोला हम तुम्हारे भोजन बनाने के लिए कहीं रुकेंगे नहीं चाहे दिन भर भूखे रहना रोहित ने कहा ठीक है। और रोहित ने पूरे भ्रमण के दौरान कभी ये नौबत नहीं आने दी बाकी सभी लोगों की यही कोशिश रहती की रोहित को भोजन बनाने का मौका ही नहीं दिया जाए तो हारकर इसे हमारी बात मानना ही पड़ेगी पर ऐसी कभी नौबत नही आई बल्कि एक बार वो अवसर जरूर आया जब रोहित के गैस चूल्हे पर सबके लिए नाश्ता तैयार करना पड़ा क्योंकि उन्हें सुब्ह जल्दी निकलना था और किसी होटल में रुककर नाश्ता करने का समय उनके पास नहीं था वे सब इसी बात पर चर्चा कर रहे थे तभी रोहित ने सभी को गर्मागर्म पोहे चाय के साथ सर्व कर दिए अशोक तो नाश्ते की तारीफ किए बिना नहीं रह सका बोला पूरे छः दिन बाद भोपाली पोहे का स्वाद चखने को मिला है। भ्रमण के दौरान जब टीम के सदस्य खाना खाने जाते तब रोहित भी अपने गैस चूल्हे पर खाना तैयार कर लेता था जितनी देर उन्हें होटल में खाना खाने में लगती उतनी देर में रोहित का खाना तैयार हो जाता जब वो आते तब तक वो खाना खाकर बर्तन साफ कर फ्री हो जाता था खाने में वो भी दाल सब्जी रोटी चावल बनाता था पर उसकी तत्परता देख वे हैरान हो जाते कई बार तो वो लोग इतनी देर से खाना खाकर आते थे कि दस बीस मिनट रोहित को आराम के लिए भी मिल जाते थे अक्सर होटलों में भीड़ रहती आर्डर देने के बाद देर तक इंतजार करना पड़ता था फिर बिल का पेमेन्ट करने में भी समय लगता था इतना समय रोहित के लिए प्याप्त होता था । एक बार जब वे भोजन करके होटल से आए तब रोहित भोजन कर रहा था उसकी थाली में भोजन देखकर वे चौंक गए भोजन होटल से कई गुना अच्छा था रोटी सब्जी दाल भी अच्छी थी पर किसी ने उसकी तारीफ नहीं की सबका अहं आड़े आ रहा था रोहित होटल की चाय कॉफी भी नहीं पीता था वो भी अपने चूल्हे पर तैयार कर लेता था वह सुनता की वे सब मँहगाई का रोना रोते रहते थे खाना बहुत मँहगा पड़ रहा है कितनी ही कटौती करो पर सबका बिल तीन हजार रुपये से कम नही बनता था नाश्ते का बिल ही आठ सौ रुपये के आसपास बनता था चाय डेढ़ सौ रुपये की पड़ रही थी रास्ते में कोल्ड ड्रिंक और पानी की बॉटल का खर्च अलग था रोहित तो सादा पानी गरम कर पीता था इसलिए उसका इस पर भी कोई खर्च नहीं होता भ्रमण के अंतिम दौर में होटल के खाने से सभी की तबियत बिगड़ गई थी रोहित बिल्कुल स्वस्थ था। होटल का खाना उन्हें हर तरह से मँहगा पड़ा था रोहित के बीस दिनों के भोजन का खर्च कुल पैंतीस सो रुपये आया था जिसमें चाय नाश्ता भी शाभिल था और वे सब बुरी तरह उधड़ गए थे किसी का बाइस हजार तो किसी का चौबीस हजार रुपया चाय नाश्ते और भोजन में खर्च हुआ था फिर भी वे सब रोहित की खिल्ली उड़ा रहे थे पर मन ही मन उसकी तारीफ भी कर रहे थे साथ ही उसकी सहनशीलता तथा मथुर व्यवहार के भी कायल हो रहे थे। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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