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कहानी: खुद की एजेंसी

रामनरेश ने पाँच साल पहले अपने गाँव बमूलिया में बिल्डिंग मटेरियल की दुकान खोली थी इसके साथ ही उसने सीमेंट तथा सरिया की एजेंसी भी ली थी उसकी दुकान चल निकली थी आज उसकी गिनती गाँव के संपन्न लोगों में होने लगी थी एजेन्सी के अलावा उसने बीस एकड़ जमीन भी खरीद ली थी जिस पर वह खेती कर रहा था  तथा दूध डेरी भी खोल रखी थी ।पक्का घर बना लिया था जिसमे सभी सुख सुविधाएँ थीं।पाँच साल पहले रामनरेश छः हजार रुपये महीने पर शहर की दुकान में काम करता था। और आज उसके पास ही पच्चीस लोग काम कर रहे थे।
पहले रामनरेश के परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी रामनरेश के दादाजी धन्नालाल जी के पास दस एकड़ जमीन थी उनके पाँच लड़के थे रामनरेश के पिताजी को बँटवारे में दो एकड़ जमीन मिली  थी रामनरेश चार भाई थे अतः उसके हिस्से में आधा एकड़ जमीन आई थी आधा एकड़ जमीन में गुजर बसर बहुत मुश्किल थी  इसलिए रामनरेश ने शहर में  एक बिल्डिंग मटेरियल बेचने वाली दुकान पर नौकरी कर ली थी दुकान के सेठ विकास गुप्ता ने वेतन के अलावा सेल्स बढाने पर  लाभ में से बीस प्रतिशत कमीशन देने का वादा किया था कुछ महीनों तक तो विकास ने अपना वादा निभाया लेकिन जब रामनरेश का कमीशन तनखावाह से पाँच गुना ज्यादा होने लगा तो  उसने कमीशन घटा कर पाँच प्रतिशत कर दिया  यह बात रामनरेश को बहुत बुरी लगी रामनरेश ने देखा कि उसके साथ ही काम करने  वाले मोहन के कमीशन में विकास सेठ ने कोई कटौती नहीं की थी जबकि रामनरेश ने बी कॉम किया था और वो दुकान के बहुत सारे और भी काम करते था फिर भी विकास सेठ का व्यवहार उसको बहुत अखर रहा था एक बार रामनरेश को माल का आर्डर देने के लिए  विकास ने थोक दुकानदार के पास भेजा  वो बहुत बडी दुकान थी वहाँ के सेल्स मेनेजर अशोक ने बताया कि हमारी योजना ग्रामीण क्षेत्रों में एजेन्सी देने की है  तुम्हारी नजर में कोई एजेन्सी लेने का इच्छुक हो तो बताना रामनरेश को यह एक सुनहरा मौका मिला उसका गाँव हाइवे निकलने के बाद कस्बानुमा जैसा हो गया था लोग तेजी से अपने पुराने मकान तोड़कर पक्के मकान बनवा रहे थे रामनरेश की आधा एकड़ जमीन हाइवे के फ्रन्ट में थी।  उसने एजेन्सी के लिए आवेदन कर दिया  कुछ दिनों में उसे एजेन्सी मिल गई उसने बैंक से लोन लेकर अपनी आधा एकड़ जमीन पर बिल्डिंग मटेरियल की दुकान खोल ली  तथा विकास गुप्ता की नौकरी छोड़ दी  उसके नौकरी छोड़ने के बाद विकास गुप्ता को उसकी कीमत पता चली  उसका दुकान सम्हालना  मुश्किल हो गया दुकान की बिक्री भी बहुत कम हो गई थी। वो रामनरेश के गाँव आया रामनरेश को फिर सै नौकरी पर रखने के लिए लेकिन हाइवे पर रामनरेश की दुकान देखकर चकित रह गया  उसकी दुकान पर पाँच लोग काम कर रहे थे जिनको रामनरेश अच्छी सेलरी दे रहा था दुकान पर ग्राहकों की भीड़ थी। रामनरेश ने विकास सेठ को देखा तो उठकर उनका स्वागत किया तथा कुर्सी पर बिठाया विकास ने देखा कि रामनरेश की दुकान पर जो रेट लिस्ट है उसमें हर वस्तु के दाम उसकी दुकान की तुलना में कम थे यही कारण था कि रामनरेश की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी  विकास की हिम्मत नहीं हुई रामनरेश को नौकरी का ऑफर देने की वह चलते समय यही सोच रहा था कि अगर उसने रामनरेश के साथ बेईमानी नहीं की होती तो आज उसकी दुकान की ये हालत नहीं होती  उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था और इसके अलावा वो कर ही क्या सकता था  पाँच साल में तो रामनरेश ने विकास को बहुत पीछे छोड़ दिया था।  रामनरेश इसमें विकासका  योगदान भी मानता था अगर वो उसके साथ अन्याय नहीं करता तो शायद अब भी वो विकास की दुकान पर काम कर रहा होता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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