सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: कुँवारापन

आजीवन कुँवारे रहे मनमोहन श्रीवास्तव जी का आज पिन्च्यानवे वर्ष की आयु में निधन हो गया था उनकी अंतिम यात्र में पूरा शहर उमड़ पड़ा था दूर दूर से और भी कई लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने आए थे शहर के कई बुजुर्गों का कहना था कि ऐसा अपार जनसमुदाय आज से पहले उन्होंने  किसी की अंतिम यात्रा में नहीं देखा था।
मनमोहन श्रीवास्तव सीधे सरल स्वभाव के धनी थे उनकी किसी से  दुश्मनी नहीं थी पूरा शहर उनका घर था और शहर में रहने वाले लोग उनके परिवार के सदस्य  उनके कुँवारे पन को लेकर शहर में तरह तरह की चर्चाएँ चलती रहतीं उनमें  से एक चर्चा यह भी थी कि मनमोहन जी को जब वे कॉलेज में पढ़ते थे तब उन्हें किसी लड़की से प्यार हुआ था उस लड़की से वे शादी भी करना चाहते थे लेकिन उनके पिताजी शिवलाल जी ने कहा कि अगर तुमने हमारी पसंद की लड़की को छोड़ किसी और से शादी की तो मैं जहर खाकर अपनी जान दे दूँगा उधर उस लड़की की शादी उसके माता पिता ने किसी और से कर दी यह सब इतनी तेजी से हुआ कि उन्हें सँभलने का सोचने समझने का और कुछ कर गुजरने का मौका ही नहीं मिला मनमोहन जी ने इसके बाद उस लड़की का जिक्र कभी किसी से नहीं किया उनके खास मित्र भी नहीं जान पाए कि वह लड़की कौन है उसकी किससे शादी हुई है और किस शहर में हुई है उसी दौरान उनके पिता शिवलाल जी ने उनकी शादी ममता नाम की लड़की से उनकी सहमति के बिना कर दी जिसका उन्होंने प्रबल विरोध किया पिताजी ने कहा कि यदि एक महीने के भीतर मेरी बात नहीं मानी तो मैं जहर खाकर अपनी जान दे दूँगा मगर वे शादी करने को तैयार ही नहीं थे मनमोहन जी सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर थे इसी से ममता के पिता मनमोहन जी से अपनी बिटिया की शादी के लिए राजी हुए थे। मनमोहन जी ने त्यागपत्र देकर अपनी वो नौकरी छोड़ दी इसका गहरा असर ममता के पिता पर हुआ वे शिवलाल जी से बोले नौकरी छोड़ने के बाद मैं ममता की शादी मनमोहन जी से नहीं कर सकता लड़की अच्छी थी सुंदर थी सुशील थी ममता के पिता ने शिवलाल के छोटे बेटे रुद्रप्रकाश से अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव रखा जिसे शिवलाल जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया इसके साथ ही मनमोहन जी को उन्होंने अपने घर से निकाल दिया मनमोहन जी बिना प्रतिरोध के घर से निकल गए किसी को उन्होंने खबर तक नहीं लगने दी कि उन्हें घर से निकाल दिया गया है वे रात के ग्यारह बजे बस स्टेण्ड की बैंच पर बैठे हुए ठंड से ठिठुर रहे थे तभी आखिरी बस से  शहर के सेठ लालाराम उतरे उनको लेने उनका बड़ा बेटा  शिखरलाल आने वाला था वे उसी का इंतजार कर रहे थे। मनमोहन जी पर उनकी नजर पड़ी तो इस हाल में उन्हें देखकर वे चौंक गए क्योंकि मनमोहन जी को वे अच्छी तरह जानते थे वो उनके बेटे शिखरलाल के गहरे मित्रों में से थे उसी समय शिखरलाल भी कार लेकर वहाँ आ गए  शिखरलाल ने जब इस हाल में उन्हें देखा तो वे समझ गए की मामला साधारण नहीं है। वे उन्हें अपने घर ले आए तथा मेहमान घर में उनकी व्यवस्था कर दी इसके पूर्व शिखरलाल ने उन्हें भोजन कराया मनमोहन जी सुबह से भूखे थे तीन दिनों तक उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया तीसरे दिन शिवलाल जी ने खुद लाला राम से कहा कि मैंने मनमोहन को घर से निकाल दिया है तुम और हम बचपन के दोस्त हैं अगर मुझसे दोस्ती रखना है तो उसे फौरन घर से निकाल दो इस पर लालाराम जी बोले अगर ऐसी बात है तो मैं अभी और इसी पल से ये दोस्ती तोड़ता हूँ और इस संबंध में मुझे अब कुछ नहीं कहना है शिवलाल जी लालाराम का जवाब सुनकर तमतमाते हुए वहाँ से निकल गए। रुद्रप्रताप की शादी शिवलाल जी ने धूमधाम से की जिसमें मनमोहन जी को नहीं शामिल होने दिया गया निमंत्रण पत्र में मनमोन जी का नाम तक नहीं छपा था। इसके बाद मनमोहन जी के जीवन की दिशा ही बदल गई कुछ महीनों तक उन्होंने मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया फिर कलेक्टर तथा मंत्री रामजीलाल के सहयोग से उन्हें बीस एकड़ सरकारी जगह एक रुपये की लीज पर मिल गई जिस पर उन्होंने नर्सरी से लेकर कॉलेज तक की पढ़ाई के लिए केन्द्र खोले पास की पंद्रह एकड़ जमीन निस्संतान जीवन लाल उन्हें इस शर्त पर दान कर गए थे कि वे वहाँ पर मेडिकल कॉलेज और बड़ा अस्पताल बनवाएँगे उनका सपना भी मनमोहन जी ने पूरा किया उनके यहाँ पढ़ने वाला कोई भी हो सकता था चाहे वो कितना ही गरीब हो उसके रहने खाने की निःशुल्क व्यवस्था वे ही करते थे करोड़ों रुपये के लालच दिए जाने पर भी उन्होंने मेडिकल कॉलेज की एक भी सीट आज तक नहीं बेची थी मनमोहन जी आजीवन कुँवारे रहकर  सबकी सेवा करते रहे थे यही कारण था कि आज उनकी अंतिम यात्रा में इतना जन सैलाब देखने को मिला था।


****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...