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कहानी: बेटी की कमाई

सुशीला उन पुरानी महिलाओं मे से थी जो बेटी की कमाई से एक रुपया भी खर्च करना पाप समझती थी उसकी कोख से जब उसकी बेटी शिवानी ने जन्म लिया था तब वो बहुत दुखी हुई थी क्योंकि वो बेटी को बोझ मानती थी और बेटे को बुढ़ापे का सहारा आज वही बेटी सुशीला का बुढ़ापे में पूरा साथ दे रही थी । सुशीला के पास बेटी की मदद लेने के सिवा कोई और चारा भी नहीं था जिस बेटे नीलेश को वो बुढापे का सहारा समझ रही थी वो खुद शिवानी पर निर्भर था। 
शिवानी ने नर्सिंग में बी एस सी की थी और वो राजधानी के बड़े सरकारी अस्पताल में स्टॉफ नर्स थी उसके साथ उसकी माँ सुशीला तथा भाई नीलेश तथा उसका बेटा रितेश तथा बेटी सोनिया रह रही थी। कमाने वाली शिवानी थी बाकी सभी उस पर निर्भर थे । सुशीला पहले कभी कभी इस बात को लेकर बहुत दुखी रहती थी की वो बैटी की कमाई पर जी रही है लेकिन अब उसने यह कहना बंद कर दिया था। शिवानी ने उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि बेटे बेटी एक बराबर होते हैं माता पिता की देखभाल करना सेवा करना दोनों का फर्ज है।और फिर मेरा आपके अलावा है ही कौन। बेटी की भलमनसाहत देखकर सुशीला को अपने किए पर बहुत पछतावा होता था। उसने शुरू से ही बेटे एवं बेटी में भेदभाव किया था हमेशा बैटे नीलेश से उसे कम समझा था नीलेश की हर इच्छा पूरी की थी शिवानी की पसंद नापसंद की कोई परवाह नहीं की थी नीलेश को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया था और शिवानी का नाम सरकारी स्कूल में लिखा दिया था । शिवानी पढ़ने में बहुत तेज थी उसने हायर सेकेण्डरी परीक्षा में जिले में टॉप किया था उसे मेरिट छात्रवृत्ति भी मिलती थी ।हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद सुशीला ने उसकी शादी रोहन से कर दी थी जबकि शिवानी आगे पढ़ना चाहती थी शादी के बाद पता चला कि रोहन किसी निशा नाम की लडकी से प्रेम करता है शिवानी से उसकी शादी माँ बाप की जिद के कारण हुई है। वो निशा के साथ शादी कर के रहना चाहता है ऐसा उसने शादी की पहली रात को ही कह दिया था शिवानी का सब कुछ शादी की पहली रात को ही ख़त्म हो गया था उसने बिना कोई विरोध किए तलाक के कागज पर दस्तखत कर दिए थे तलाक के बाद जब शिवानी मायके आई तो सुशीला ने उसका जीना हराम कर दिया हारकर शिवानी गर्ल्स होस्टल मैं रहने चली गई उसने एजुकेशन लोन लेकर बी एस सी नर्सिंग में दाखिला ले लिया होस्टल का खर्च वह ट्यूशन पढ़ा कर निकाल लेती थी। बी एस सी नर्सिंग में भी उसने यूनीवर्सिटी में टॉप किया था उपाधि वितरण समारोह में मुख्यमंत्री जी आए थे उन्होंने शिवानी की प्रतिभा से खुश होकर सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। लेकिन वो चयन परीक्षा में भी टॉप आई थी। इस से मुख्यमंत्री जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उसचा पूरा एजुकेशन लोन माफ कर दिया था। शिवानी एक कुशल नर्स साबित हुई जिससे उसकी ड्यूटी आई सी यू में लगाई गई उसे अस्पताल परिसर में ही सरकारी आवास मिल गया था इसलिए उसने गर्ल्स होस्टल छोड़ दिया तथा सरकारी आवास में रहने लगी। उधर सुशीला ने अपने बेटे नीलेश की शादी धूमधाम से की थी उसमें शिवानी को नहीं बुलाया गया था क्योंकि वो तलाकशुदा थी। शिवानी के पिता मदनलाल की कपड़े की दुकान थी उसी दुकान पर नीलेश भी बैठता था नीलेश की शादी को पाँच साल हो गए थे। उसके यहाँ एक बेटा और एक र बेटी का जन्म हो गया था सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अचानक एक रात दुकान में आग लग गई तंग रास्ता होने के कारण दमकल देर से पहुँची तब तक दुकान जलकर राख हो चुकी थी मदन लाल यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए हार्ट अटेक से उनका निधन हो गया दुकान में रखे बीस लाख रुपये भी जलकर स्वाहा हो गए थे नीलेश के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो फिर से दुकान पहले जैसी कर सके घर में जो बचत के पैसे थे उससे घर का खर्च जैसे तैसे चल रहा था। इस बुरे दौर से नीलेश को डिप्रेशन हो गया फिर उसका दिमागी संतुलन गड़बडा गया इस हालत में नीलेश की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई सुउसेशीला को बुढापे में नीलेश की देखभाल करना पड़ रही थी नीलेश के इलाज में सुशीला की ज्वेलरी बिकने लगी थी। तभी एक दिन नीलेश का साला प्रकाश आया और दोनों बच्चों को छोड़कर चला गया उसने कहा इन बच्चों की मम्मी ने दूसरी शादी कर ली है अब तुम्हारे बच्चे तुम सम्हालो। हुशीला के ऊपर मुसीबत के पहाड़ पे पहाड़ टूट रहे थे। वह असहाय लाचार बेबस और दुखी नजर आने लगी थी। शिवानी को जब सारी बात का पता चला तब शिवानी सबको घर ले आई सुशीला की हालत यह थी उसके पास कुछ बचा ही नहीं था दो वक्त की रोटी जुटा पाना उसके लिए बहुत मुश्किल हो गया था। यह सब सोचकर वो शिवानी के घर चली आई तब से शिवानी धैर्य पूर्वक सबका ख्याल भी रख रही थी तथा सेवा एवं दवा की व्यवस्था भी कर रही थी।उसे जीने का मकसद मिल गया था।,


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रचनाकार
प्रीप कश्यप

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