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कहानी: इस्तीफा

बीस साल पहले सरकारी शिक्षक के पद से इस्तीफा देने वाले अविनाश सर आज किसी परिचय के मोहताज नहीं थे  उनका संग्रामपुर ग्राम में स्थापित अभिनव शिक्षा परिसर दुनिया का सबसे अच्छा  शिक्षा केन्द्र बन गया था पिछले पाँच सालों से उनके  परिसर से शत प्रतिशत प्लेसमेन्ट हो रहा था।
पच्चीस  वर्ष पूर्व अविनाश सर संग्राम पुर की शासकीय माध्यमिक शाला  में शिक्षक पद  पर नियुक्त होकर आए थे इसके पहले वे एक निजी विद्यालय में शिक्षक रहे थे  लेकिन  वहाँ के शिक्षण से वे संतुष्ट नहीं थे वे जिस तरह से बच्चों को पढ़ाना चाहते थे वो तरीका  शाला प्रबंधन को पसंद नहीं था। आखिर उन्हें वहाँ से इस्तीफा देना पड़ा था  इसके बाद वे सरकारी स्कूल में शिक्षक बन गए थे  वे संग्रामपुर के  स्कूल में पाँच साल रहे वे बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन शाला प्रभारी बनने के बाद वे कुछ कर नहीं पा रहे थे इतना अधिक काम की बच्चों को पढ़ाने का उन्हें अवसर ही नहीं मिलता था जो उनके साथ स्टॉफ था  वे सब सोर्स सिफारिश वाले थे सबकी ऊँची पहुँच थी वे अपनी मर्जी से स्कूल आते और अपनी मर्जी से जाते थे पूरे समय कुर्सी पर बैठकर हँसी मजाक करते रहते पर कक्षा में नहीं जाते थे परीक्षा में सामूहिक नकल कराकर  अपना रिजल्ट सुधार लेते थे जो छात्र साल भर स्कूल नहीं आता परीक्षा में शामिल भी नहीं होता था उसे भी पास करा दिया जाता था उसकी कॉपी किसी और से लिखवा दी जाती थी। वे सरकारी काम में उलझे रहते स्टॉफ पढ़ाता नहीं था बच्चे स्कूल आते और मध्यान्ह भोजन कर के ढाई बजे घर चले जाते तीन बच्चे बाकी सब शिक्षक चले जाते थे  अविनाश सर पाँच बजे तक रुककर काम करते रहते थे इसके बाद भी  उनकी पूछ नहीं थी क्योंकि उनका कोई सरपरस्त नहीं था।  हद तो तब हो गई कि इतना सब कुछ करने के बाद उनका तबादला  संग्रामपुर से सत्तर कि मी दूर स्थित गाँव शोभाखेड़ी में कर दिया गया  था उनके स्थान पर जो शिक्षक रमेश आ रहे थे  उनका पढाई से कोई लेना देना नहीं था पर वे सरपंच के भाई थे। यही उनका प्लस पाइंट था। अविनाश सर वैसे ही अपनी नौकरी से संतुष्ट नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।  सभी ने उन्हें बहुत समझाया पर उन्होंने किसी की एक न सुनी। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने संग्रामपुर में  अभिनव प्राइमरी स्कूल खोल लिया था शुरू में उनके स्कूल में मात्र बीस बच्चे थे और वे इकलौते शिक्षक  पर वे कमाल के शिक्षक थे  बच्चों की पढ़ाई अच्छी  होने से अभिनव स्कूल  में सब अपने बच्चों का एडमीशन कराने लगे  अब उन्होंने एक शिक्षक की ओर व्यवस्था कर ली थी ।  पाँच साल में हालत यह हो गई की सरकारी स्कूल में बीस बच्चे ही रह गए थे और उनके विद्यालय  में दौ सो छात्र छात्रा हो गए थे अब उनके यहाँ आठ शिक्षक अध्तापन कर रहे थे।  धीरे धीरे अभिनव शिक्षा परसिर बड़ा होता चला गया  पंद्रह साल में वो दो सौ एकड़ जमीन में फैला विस्तृत शिक्षा परिसर बन गया था जिसमें आठ हजार विद्यार्थी  , जो देश विदेश से आए थे पढ़ रहे थे।  परिसर में मेडिकल कॉलेज तथा इंजीनियरिंग कालेज भी थे  उनके परिसर में हर विषय की पढ़ाई होती थी हर वर्ग के लोगों के बच्चे वहाँ पढ़ रहे थे अविनाश सर के परिसर में गरीब से गरीब लड़का भी पढ़ रहा था  और अमीर से अमीर भी कोई उन्हें बीस हजार रुपये महीने  फीस देता था तो कोई फीस बिल्कुल ही नहीं देता था  पर उसकी पढ़ाई में वे कोई कमी नहीं आने देते थे। बीस साल में उनका शिक्षा परिसर  बहुत बड़ा और प्रमुख परिसर  बन गया था।  और उनका नाम  सारी दुनिया में मशहूर हो गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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